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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2610

वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा महात्मा श्रीराम अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे हैं। उनके शरीरपर महीन रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा है तथा वे अविनाशी महर्षियोंके साथ विराजमान हैं॥ १२ ॥

निकट जा हाथ जोड़कर उन्होंने श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और धर्मका चिन्तन करते हुए इन्द्रियोंको काबूमें करके वे धर्मके ज्ञाता श्रीरामसे बोले— ॥ १३ ॥

'रघुकुलनन्दन! मैं अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक करके आया हूँ। राजन्! आप मुझे भी अपने साथ चलनेके दृढ़ निश्चयसे युक्त समझें॥ १४ ॥

'वीर! आज इसके विपरीत आप मुझसे और कुछ न कहियेगा; क्योंकि उससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई दण्ड न होगा। मैं नहीं चाहता कि किसीके विशेषतः मुझ-जैसे सेवकके द्वारा आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन हो'॥

शत्रुघ्नका यह दृढ़ विचार जानकर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा— 'बहुत अच्छा'॥ १६ ॥

उनकी यह बात समाप्त होते ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ और राक्षसोंके समुदाय बहुत बड़ी संख्यामें वहाँ आ पहुँचे॥ १७ ॥

साकेत-धामको जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरामके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वे सभी वानर सुग्रीवको आगे करके वहाँ पधारे थे॥ १८ ॥

उनमेंसे कितने ही देवताओंके पुत्र थे, कितने ही ऋषियोंके बालक थे और कितने ही गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुए थे। श्रीरघुनाथजीके लीलासंवरणका समय जानकर वे सब-के-सब वहाँ आये थे। उक्त सभी वानर और राक्षस श्रीरामको प्रणाम करके बोले— ॥ १९ १/२ ॥

'राजन्! हम भी आपके साथ चलनेका निश्चय लेकर यहाँ आये हैं। पुरुषोत्तम श्रीराम! यदि आप हमें साथ लिये बिना ही चले जायँगे तो हम यह समझेंगे कि आपने यमदण्ड उठाकर हमें मार गिराया है'॥ २०-२१ ॥

इसी बीचमें महाबली सुग्रीव भी वीर श्रीरामको विधिपूर्वक प्रणाम करके अपना अभिप्राय निवेदन करनेके लिये उद्यत हो बोले— ॥ २२ ॥

'नरेश्वर! मैं वीर अङ्गदका राज्याभिषेक करके आया हूँ। आप समझ लें कि मेरा भी आपके साथ चलनेका दृढ़ निश्चय है'॥ २३ ॥