श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 526, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंगन्धर्वराजके समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा— ‘नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं?’ यह कहकर उसे धारण करनेमें कुशल न होनेके कारण सीता बारम्बार मोहमें पड़ जाती थीं— भूल कर बैठती थीं॥
चीर-धारणमें कुशल न होनेसे जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गलेमें डाल दूसरा हाथमें लेकर चुपचाप खड़ी रहीं॥ १३ ॥
तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीराम जल्दीसे उनके पास आकर स्वयं अपने हाथोंसे उनके रेशमी वस्त्रके ऊपर वल्कल-वस्त्र बाँधने लगे॥ १४ ॥
सीताको उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीरामकी ओर देखकर रनवासकी स्त्रियाँ अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं॥ १५ ॥
वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीरामसे बोलीं— ‘बेटा! मनस्विनी सीताको इस प्रकार वनवासकी आज्ञा नहीं दी गयी है॥ १६ ॥
‘प्रभो! तुम पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये जबतक निर्जन वनमें जाकर रहोगे, तबतक इसीको देखकर हमारा जीवन सफल होने दो॥ १७ ॥
‘बेटा! तुम लक्ष्मणको अपना साथी बनाकर उनके साथ वनको जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनिकी भाँति वनमें निवास करनेके योग्य नहीं है॥ १८ ॥
‘पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो। भामिनी सीता यहीं रहे। तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो (परंतु सीताको तो रहने दो)’॥ १९ ॥
माताओंकी ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथनन्दन श्रीरामने सीताको वल्कल-वस्त्र पहना ही दिया। पतिके समान शीलस्वभाववाली सीताके वल्कल धारण कर लेनेपर राजाके गुरु वसिष्ठजीके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उन्होंने सीताको रोककर कैकेयीसे कहा— ॥ २०-२१ ॥
‘मर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्मकी ओर पैर बढ़ानेवाली दुर्बुद्धि कैकेयी! तू केकयराजके कुलकी जीती-जागती कलङ्क है। अरी! राजाको धोखा देकर अब तू सीमाके भीतर नहीं रहना चाहती है?॥ २२ ॥
‘शीलका परित्याग करनेवाली दुष्टे! देवी सीता वनमें नहीं जायँगी। रामके लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासनपर ये ही बैठेंगी॥ २३ ॥