भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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सेवित था। वहाँके ग्रामोंकी बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी॥ ८—१०॥

कोसलदेशसे आगे बढ़नेपर धैर्यवानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यममार्गसे ऐसे राज्यमें होकर निकले, जो सुख-सुविधासे युक्त, धन-धान्यसे सम्पन्न, रमणीय उद्यानोंसे व्याप्त तथा सामन्त नरेशोंके उपभोगमें आनेवाला था॥ ११॥

उस राज्यमें श्रीरघुनाथजीने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गाका दर्शन किया, जो शीतल जलसे भरी हुई, सेवारोंसे रहित तथा रमणीय थीं। बहुत-से महर्षि उनका सेवन करते थे॥ १२ ॥

उनके तटपर थोड़ी-थोड़ी दूरपर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते थे। समय-समयपर हर्षभरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्डका सेवन करती हैं। वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं॥ १३ ॥

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथीकी शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वोंकी पत्नियाँ उनके जलका सदा सेवन करती हैं॥ १४ ॥

गङ्गाके दोनों तटोंपर देवताओंके सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ास्थल हैं। उनके किनारे देवताओंके बहुत-से उद्यान भी हैं। वे देवताओंकी क्रीड़ाके लिये आकाशमें भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनीके रूपमें विख्यात हैं॥ १५ ॥

प्रस्तरखण्डोंसे गङ्गाके जलके टकरानेसे जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है। जलसे जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदीका निर्मल हास है। कहीं तो उनका जल वेणीके आकारका है और कहीं वे भँवरोंसे सुशोभित होती हैं॥ १६ ॥

कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है। कहीं वे महान् वेगसे व्याप्त हैं। कहीं उनके जलसे मृदङ्ग आदिके समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदिके समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है॥ १७॥

उनके जलमें देवताओंके समुदाय गोते लगाते हैं। कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदोंसे आच्छादित होता है। कहीं विशाल पुलिनका दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका-राशिका॥ १८ ॥

हंसों और सारसोंके कलरव वहाँ गूँजते रहते हैं। चकवे उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते हैं। सदा मदमत्त रहनेवाले विहंगम उनके जलपर मँडराते रहते हैं। वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं॥ १९ ॥