भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 669

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली नरकगामिनी कैकेयि! धर्मपरायणा माता कौसल्याको पति और पुत्रसे वञ्चित करके अब तू किस लोकमें जायगी?॥ १२ ॥

‘क्रूरहृदये! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिताके तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओंके आश्रयदाता हैं। क्या तू उन्हें इस रूपमें नहीं जानती है?॥ १३ ॥

‘पुत्र माताके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदयसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह माताको अधिक प्रिय होता है। अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं (किंतु पुत्र प्रियतर होता है)॥ १४ ॥

‘एक समयकी बात है कि धर्मको जाननेवाली देव-सम्मानित सुरभि (कामधेनु) ने पृथ्वीपर अपने दो पुत्रोंको देखा, जो हल जोतते-जोतते अचेत हो गये थे॥ १५ ॥

‘मध्याह्नका समय होनेतक लगातार हल जोतनेसे वे बहुत थक गये थे। पृथ्वीपर अपने उन दोनों पुत्रोंको ऐसी दुर्दशामें पड़ा देख सुरभि पुत्रशोकसे रोने लगी। उसके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये॥ १६ ॥

‘उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभिके नीचेसे होकर कहीं जा रहे थे। उनके शरीरपर कामधेनुके दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े॥ १७ ॥

‘जब इन्द्रने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा— आकाशमें सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दुःखी हो दीनभावसे रो रही हैं॥ १८ ॥

‘यशस्विनी सुरभिको शोकसे संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले— ॥ १९ ॥

‘सबका हित चाहनेवाली देवि! हमलोगोंपर कहींसे कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? बताओ, किस कारणसे तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है?॥ २० ॥

‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेमें चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २१ ॥

‘देवेश्वर! पाप शान्त हो। तुमलोगोंपर कहींसे कोई भय नहीं है। मैं तो अपने इन दोनों पुत्रोंको विषम अवस्था (घोर सङ्कट) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ॥ २२ ॥

‘ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दुःखी हैं, सूर्यकी किरणोंसे बहुत तप गये हैं और ऊपरसे वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है॥ २३ ॥