श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 715, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवासीवाँ सर्ग
भरतका सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाजके आश्रमपर जाना
शृङ्गवेरपुरमें ही गङ्गाके तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातःकाल उठे और शत्रुघ्नसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
‘शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुहको शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गाके पार उतारेगा’ ॥ २ ॥
उनसे इस प्रकार प्रेरित होनेपर शत्रुघ्नने कहा— ‘भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीरामका चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’ ॥ ३ ॥
वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेलामें आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला— ॥ ४ ॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण भरतजी! इस नदीके तटपर आप रातमें सुखसे रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न?’ ॥
गुहके स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचनको सुनकर श्रीरामके अधीन रहनेवाले भरतने यों कहा— ॥ ६ ॥
‘बुद्धिमान् निषादराज! हम सब लोगोंकी रात बड़े सुखसे बीती है। तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया। अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओंद्वारा हमें गङ्गाके पार उतार दें’ ॥ ७ ॥
भरतका यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगरमें गया और भाई-बन्धुओंसे बोला— ॥ ८ ॥
‘उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो। नौकाओंको खींचकर घाटपर ले आओ। भरतकी सेनाको गङ्गाजीके पार उतारूँगा’ ॥ ९ ॥
गुहके इस प्रकार कहनेपर अपने राजाकी आज्ञासे सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओरसे पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये ॥ १० ॥
इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नामसे प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्तिकके चिह्नोंसे अलंकृत होनेके कारण उन्हीं चिह्नोंसे पहचानी जाती थीं। उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं,