भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 716

जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं। स्वर्ण आदिके बने हुए चित्रोंसे उन नौकाओंकी विशेष शोभा हो रही थी। उनमें नौका खेनेके लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलानेके लिये तैयार बैठे थे। वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं॥ ११॥

उन्हींमेंसे एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नावपर माङ्गलिक शब्द हो रहा था॥ १२॥

उसपर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे। तत्पश्चात् उसपर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथकी जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं। तदनन्तर राजपरिवारकी दूसरी स्त्रियाँ बैठीं। गाड़ियाँ तथा क्रय-विक्रयकी सामग्रियाँ दूसरी-दूसरी नावोंपर लादी गयीं॥ १३-१४॥

कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर^१ अपने खेमोंमें छूटी हुई वस्तुओंको सँभालने लगे। कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाटपर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामानको 'यह मेरा है, यह मेरा है' इस तरह पहचानकर उठाने लगे। उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाशमें गूँज उठा॥ १५॥

उन सभी नावोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। सबके ऊपर खेनेवाले कई मल्लाह बैठे थे। वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्योंको तीव्रगतिसे पार ले जाने लगीं॥ १६॥

कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियोंसे भरी थीं, कुछ नावोंपर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएं गाड़ियों, उनमें जोते जानेवाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदिको ढो रही थीं॥ १७॥

वे दूसरे तटपर पहुँचकर वहाँ लोगोंको उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जलमें उनकी विचित्र गतियोंका प्रदर्शन करने लगे॥ १८॥

वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित होनेवाले हाथी महावतोंसे प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे। उस समय वे पंखधारी पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे॥

कितने ही मनुष्य नावोंपर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकोंसे बने हुए बेड़ोंपर सवार थे। कुछ लोग बड़े-बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओंसे ही तैरकर पार हो रहे थे॥ २०॥