श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार मल्लाहोंकी सहायतासे वह सारी पवित्र सेना गङ्गाके पार उतारी गयी। फिर वह स्वयं मैत्र^२ नामक मुहूर्त्तमें उत्तम प्रयागवनकी ओर प्रस्थित हो गयी॥ २१॥
वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेनाको सुखपूर्वक विश्रामकी आज्ञा दे उसे प्रयागवनमें ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभाके सदस्योंके साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाजका दर्शन करनेके लिये गये॥ २२ ॥
देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर भरतने उन विप्रशिरोमणिके रमणीय एवं विशाल वनको देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियोंसे सुशोभित था॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९॥
१. यहाँ ‘आवासमादीपयताम्’ का अर्थ कुछ टीकाकारोंने यह किया है कि ‘वे अपने आवासस्थानमें आग लगाने लगे।’ आवश्यक वस्तुओंको लाद लेनेके बाद जो मामूली झोंपड़े और नगण्य वस्तुएँ शेष रह जाती हैं, उनमें छावनी उखाड़ते समय आग लगा देना—यह सेनाका धर्म बताया गया है। इसके दो रहस्य हैं, किसी शत्रुपक्षीय व्यक्तिके लिये अपना कोर्इ निशान न छोड़ना—यह सैनिक नीति है। दूसरा यह है कि इस तरह आग लगाकर जानेसे विजय-लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है—ऐसा उनका परम्परागत विश्वास है।
२. दो-दो घड़ी (दण्ड) का एक मुहूर्त होता है। दिनमें कुल पंद्रह मुहूर्त बीतते हैं। इनमेंसे तीसरे मुहूर्तको ‘मैत्र’ कहते हैं। बृहस्पतिने पंद्रह मुहूर्तोंके नाम इस प्रकार गिनाये हैं—रौद्र, सार्प, मैत्र, पैत्र, वासव, आप्य, वैश्व, ब्राह्म, प्राज, ऽइश, ऐन्द्र, ऐन्द्राग्नरु, नैर्ऋरुत, वारुणार्यमण तथा भगी। जैसा कि वचन है—
रौद्रः सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो वासव एव च। आप्यो वैश्वस्तथा ब्राह्मः प्राजेशैन्द्रास्तथैव च॥
ऐन्द्राग्नो नैर्ऋरुतश्चैव वारुणार्यमणो भगी। एतेऽह्नि क्रमशो ज्ञेया मुहूर्ता दश पञ्च च॥