श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरामानन्दतीर्थकी रामायणकूट-व्याख्या। इसके अतिरिक्त चतुर्थदीपिका, रामायणविरोधपरिहार, रामायणसेतु, तात्पर्यतरणि, शृङ्गारसुधाकर रामायणसप्तबिम्ब, मनोरमा आदि अनेक टीकाएँ हैं। ‘रीडिंग्स इन रामायण’ के अनुसार इतनी टीकाएँ और हैं—१ अहोबलकी ‘वाल्मीकि-हृदय’ (तनिश्लोकी) व्याख्या, उनके शिष्यकी विरोधभञ्जिनी टीका, माधवाचार्यकी रामायणतात्पर्यनिर्णय-व्याख्या, श्रीअप्पय दीक्षितेन्द्रकी भी इसी नामकी एक अन्य व्याख्या (जिसमें उन्होंने रामायणको शिवपरक सिद्ध किया है), प्रबालमुकुन्दसूरिकी रामायणभूषण-व्याख्या एवं श्रीरामभद्राश्रमकी सुबोधिनी टीका। डाक्टर एम० कृष्णमाचारीने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर’ में कऽइ ऐसी टीकाओंका उल्लेख किया है, जिनके लेखकोंका पता नहीं है। उदाहरणार्थ—अमृतकतक, रामायणसारदीपिका, गुरुबाला चित्तरञ्जिनी, विद्वन्मनोरञ्जिनी आदि। उन्होंने वरदराजाचार्यके रामायणसारसंग्रह, देवरामभट्टकी विषयपदार्थव्याख्या, नृसिंह शास्त्रीकी कल्पवल्लिका, वेंकटाचार्यकी रामायाणार्थप्रकाशिका, वेंकटाचार्यके रामायण- कथाविमर्श आदि व्याख्याग्रन्थोंका भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त कऽइ टीकाएँ ‘मध्वविलास’ वाली प्रतिमें संगृहीत हैं। ज्ञात ये सब तो संस्कृत व्याख्याएँ हैं। अज्ञात संस्कृत व्याख्याओं, हिन्दीके अनेकानेक द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैतादि मतावलम्बियों, आर्यसमाजकी व्याख्याओं, बंगला, मराठी, गुजराती आदि विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं तथा फ्रेंच, अंग्रेजी आदि अन्य विदेशी भाषाओंमें किये गये अनुवाद, टीका-टिप्पणियोंकी तो यहाँ कोऽइ बात ही नहीं छेड़नी है; क्योंकि उनका अन्त ही नहीं होना है।
रामायणके काव्यगुण, अन्य विशेषताएँ
कुछ लोगोंने तो यहाँतक कहा है कि रामायणके लक्षणोंके आधारपर ही दण्डी आदिने काव्योंकी परिभाषा बतलायी। त्र्यम्बकराज मखानीने सुन्दरकाण्डकी व्याख्यामें प्रायः सभी श्लोकोंको अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्डनामकी सार्थकता दिखलायी है। वास्तवमें बात भी ऐसी ही है। सुन्दरका० ५वाँ सर्ग तो नितान्त सुन्दर है ही। श्रीमखानीने सभीके उदाहरण भी दिये हैं। यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिकविने किसी प्राचीन काव्यको बिना ही देखे, किसी ग्रन्थसे बिना ही सहारा लिये सर्वोत्तम काव्यका निर्माण किया। इनका प्राकृतिक चित्रण तो सुन्दर है ही, संवाद सर्वाधिक सुन्दर है। हनुमान्जीकी वार्तालापकुशलता सर्वत्र देखते बनती है। श्रीरामकी प्रतिपादनशैली, दशरथजीकी संभाषणपद्धति, (अयोध्याकाण्ड २रा सर्ग) किमधिकं कहीं-कहीं रावणका भी कथन (लंकाकाण्ड १६वाँ सर्ग) बहुत सुन्दर है। इन्होंने ज्योतिषशास्त्रको