श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 875, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुनिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उन महर्षिसे दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही—॥ ९॥
‘भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणोंसे हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझपर मुनीश्वरका महान् अनुग्रह है॥
‘परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत-से वन हों, जलकी भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ’॥ ११॥
श्रीरामका यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्यने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले—॥ १२॥
‘तात! यहाँसे दो योजनकी दूरीपर पञ्चवटी नामसे विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जलकी अधिक सुविधा है॥
‘वहीं जाकर लक्ष्मणके साथ आप आश्रम बनाइये और पिताकी यथोक्त आज्ञाका पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये॥ १४॥
‘अनघ! आपका और राजा दशरथका यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपके प्रति स्नेह होनेके कारण अच्छी तरह विदित है॥ १५॥
‘आपने तपोवनमें मेरे साथ रहनेकी और वनवासका शेष समय यहीं बितानेकी अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँसे अन्यत्र रहने योग्य स्थानके विषयमें मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है? यह मैंने अपने तपोबलसे जान लिया है (आपने ऋषियोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंके वधकी प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञाका निर्वाह अन्यत्र रहनेसे ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसोंका आना-जाना नहीं होता)॥ १६॥
‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटीमें जाइये। वहाँकी वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी॥
‘रघुनन्दन! वह स्पृहणीय स्थान यहाँसे अधिक दूर नहीं है। गोदावरीके पास (उसीके तटपर) है, अतः मैथिलीका मन वहाँ खूब लगेगा॥ १८॥
‘महाबाहो! वह स्थान प्रचुर फल-मूलोंसे सम्पन्न, भाँति-भाँतिके विहङ्गोंसे सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है॥ १९॥