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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 908, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 908

सामने आकर आग उगलनेवाले मुखोंसे घोर शब्द करने लगीं॥ १० १/२ ॥

सूर्यके निकट परिघके समान कबन्ध (सिर कटा हुआ धड़) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्याके बिना ही सूर्यको ग्रसने लगा। हवा तीव्र गतिसे चलने लगी एवं सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी॥ ११-१२ ॥

बिना रातके ही जुगनूके समान चमकनेवाले तारे आकाशमें उदित हो गये। सरोवरोंमें मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये॥ १३ ॥

उस क्षणमें वृक्षोंके फूल और फल झड़ गये। बिना हवाके ही बादलोंके समान धूसर रंगकी धूल ऊपर उठकर आकाशमें छा गयी॥ १४ ॥

वहाँ वनकी सारिकाएँ चें-चें करने लगीं। भारी आवाजके साथ भयानक उल्काएँ आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगीं॥ १५ ॥

पर्वत, वन और काननोंसहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथपर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखोंमें आँसू आने लगे॥ १६-१७ ॥

उसके सिरमें दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्धसे निवृत्त नहीं हुआ। उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातोंको देखकर खर जोर-जोरसे हँसने लगा और समस्त राक्षसोंसे बोला—॥ १८ १/२ ॥

‘ये जो भयानक दिखायी देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बलके भरोसे कोऽइ परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओंको कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशसे तारोंको भी गिरा सकता हूँ॥ १९-२० ॥

‘यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्युको भी मौतके मुखमें डाल सकता हूँ। आज बलका घमंड रखनेवाले राम और उसके भाऽइ लक्ष्मणको तीखे बाणोंसे मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता॥ २१ १/२ ॥

‘जिसे दण्ड देनेके लिये राम और लक्ष्मणकी बुद्धिमें विपरीत विचार (क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके भाव) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफलमनोरथ हो जाय॥ २२ १/२ ॥

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