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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages
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तरुणी रमणी रतिरम्यतरा प्रमदा सुखदा च सदा समदा।
यदि सा सुभगा हृदये निहिता क्व जयः क्व जय. क्व जयः क्व जयः।¹

युवावस्था को प्राप्त, रमण करने योग्य, रति से भी अधिक रम्य, सुख देने वाली, सदा काम-मद से युक्त सुन्दरी प्रमदा यदि हृदय में बस गयी तो फिर जय कहाँ? (तब तो महान व्यक्ति की भी पराजय निश्चित है)।

(र) गद्यात्मक सूक्तियाँ :

निजशरीरस्य कतिचिद्दिनस्थायियौवनस्य पुराषान्तररमणाद् गृहाण फलम्।²

अन्य पुरुष के साथ रमण करती हुई अपने शरीर, जिसका यौवन कतिपय दिनों तक ही स्थिर रहेगा का फल प्राप्त कर ले।

युक्तमिदं कर्तव्यमेव परं दुष्करं निन्दितं च कुलस्त्रीणाम्।³

कुल स्त्रियों (उच्चकुल में उत्पन्न हुई) के लिये यह कर्म दुष्कर एवं निन्दित है।

व्यसनागमे, यदा कस्यचिदुपरि विपद् आपतति तदा दुर्जना. दुष्टाः नित्यम्।⁴

विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता)।

यो दान कुर्यात्स भवेत्सर्वसम्पदां स्थानम्।⁵

जो दान करता है वह सकल सम्पत्तियों का आगार होता है।

यतो राज्ञां दुष्टनिग्रह. शिष्टपालनं च स्वर्गाय।⁶


1 शुकसप्तति., श्लोक स० 338, पृष्ठ स० 280.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 7.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 8.
4 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 9.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 16.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 20.

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दुष्टों का दमन करना तथा शिष्टजनो का पालन करना राजा का धर्म है—इससे उसे स्वर्ग मिलता है।

यतो बालकादपि हितं वाक्य ग्राह्यम्।¹

बालक से भी हितवाक्य ग्रहण करना चाहिए।

विद्वद्भिर्विपद्यप्युच्चैः स्थातव्यम्।²

विद्वानो को विपत्ति में भी प्रसन्न रहना चाहिये।

परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।³

राजा के बिना मनुष्य की कहीं पूंजा (सक्रिया, प्रतिष्ठा) नहीं होती।

यतो जनो धनमित्राः।⁴

धन के होने से ही उसके सब मित्र बनते हैं।

यतो हीनपुण्यो बुद्ध्या मुच्यते।⁵

जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है उसे बुद्धि छोड़ देती है।

पित्रार्जित द्रव्यं भोगिनं कं न करोति।⁶

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता।

एकोऽपि त्वदीयः सुतः श्लाघ्यः।⁷

तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 22.
2 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 31.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 34.
4 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 43.
5 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 49.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 52.
7 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 120

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कृतक मन्ये भयं योषिता।¹

स्त्रियो का भय कृत्रिम मानता हूँ।

दुर्लभोऽय बुधः। सुलभाः खलु नार्य।²

यह विद्वान दुर्लभ है, नारियाँ तो सुलभ होती हैं।

ततः स्त्रीणां वशगः को न विडम्बितः।³

स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता।

यतः सता सन्नतगात्रि सङ्गतं मनीषिभिः।⁴

सज्जनो के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

य. कश्चिद्धितं वाक्यं शृणोति करोति च स शर्मभाग्भवति।⁵

जो कोई हितवाक्य सुनता है और तदनुसार कार्य करता है वह इस लोक तथा परलोक मे कल्याण का भागी होता है।

सत्यस्य वाचो वक्ता श्रोता च न लभ्यते।⁶

सत्य की बात कहने वाला और सुनने वाला दोनो नहीं मिलते।

(ल) ‘‘पद्यात्मक सूक्तियाँ ‘‘प्राकृत भाषा में’’ :

छिज्जउ सीसं अह होउ बन्धणं चअउ सव्वहा लच्छी।
पडिवण्णपालणे सुपुरिसाणं जं होउ तं होउ।¹


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 233.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 234.
3 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 241
4 शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 265.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 272.
6 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 273.

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सहायक पुस्तकों की सूची

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शीर्षं छिद्यताम् अपभवतु बन्धनं चलतु सर्वथा लक्ष्मीः।
प्रतिपन्नपालने सुपुरुषाणां यद् भवतु तद् भवतु।

अर्थात् स्वीकार किये गये कार्य को पूरा करने में सत्पुरुषों का जो हो वह हो, चाहे शिर कट जाय, बन्धन में पड जायें अथवा लक्ष्मी चली जायें परन्तु स्वीकृत का पालन करते हैं।

पिअर विढत्तइ दव्वइ चुड्डिरि को ण करेइ।
सइँ बिढवइ सइँ भोजअइ विरला जणणि जणेइ।।$^२$

पित्रार्जितं द्रव्य भोगिनं कं न करोति।
स्वयमर्जयति स्वयं भुङ्क्ते विरला जननी जनयति।।

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता। जो स्वयं धन पैदा कर उसका स्वयम् उपभोग करता है ऐसे पुत्र को कोई विरली माता ही पैदा करती है।

महिलारत्ता पुरिसा छेआ वि ण संभरन्ति अप्पाणं
इअरे उण तरुणीणं पुरिसा सलिलं व हत्थगअं।।"

(महिलारक्ता. पुरुषाश्छेका अपि न सम्भरन्ति आत्मानम्।
इतरे पुनस्तरुणीनां पुरुषा. सलिलमेव हस्तगतम्।।)

स्त्रियो में अनुरक्त नागरिक भी पुरुष अपने पर अधिकार नहीं रख पाते (स्त्री के वश में रहते हैं) और अन्य पुरुष स्त्रियों को हस्तगत जल ही होते हैं-जैसे अञ्जलिगत जल धीरे-धीरे बह जाता है उसी प्रकार वे स्त्रियों के हाथ में नहीं आते और स्वाधीन होते हैं।


1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 11, पृष्ठ स० 11.
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 67, पृष्ठ स० 52.
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 109, पृष्ठ स० 87-88.

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अहरं करं कवोलं थणजुअल णाहिमण्डलं रमणं ।
इत्थिअजणसामण्णं हिअअं जं जस्स तं तस्स ।।$^1$

(अधरः करः कपोलः स्तनयुगलं नाभिमण्डल रमणम् ।
स्त्रीजनसामान्य हृदयं यद् यस्या तत् तस्याः ।।)

अधर, कर, कपोल, स्तनयुगल, नाभिमण्डल और जघन प्रदेश ये सब तो सभी स्त्रियों में समान होते हैं किन्तु हृदय जो है वह जिस किसी के ही होता है—हृदय से प्रेम करने वाली प्रेयसी कोई ही होती है।

अचला चलन्ति पलए मज्जाअं साअरा विलंघन्ति ।
गरुआ वि तह विकाले पडिवण्ण साध सिढिलेन्ति ।$^2$

(अचलाश्चलन्ति प्रलये मर्यादां सागरा विलङ्घन्ते
गुरुका अपि तथा विकाले प्रतिपन्नसाधनं न शिथिलयन्ति ।।)

प्रलय मे पर्वत चलते हैं, सागर भी मर्यादा त्याग देते हैं, किन्तु विपत्ति में भी महान व्यक्ति स्वीकृत के पालन को शिथिल नहीं करते।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 153, पृष्ठ स० 122.
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 165, पृष्ठ स० 130.

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सहायक पुस्तकों की सूची

क्रसं०पुस्तकलेखक व प्रकाशक
1साहित्य दर्पणविश्वनाथ, स० डा० निरूपण विद्यालंकार, साहित्य भंडार सुभाष बाजार, मेरठ
2.काव्यालंकारभामह
3.काव्यालंकाररूद्रट, व्याख्याकार श्री रामदेव शुक्ल 1966, चौखम्भा प्रकाशन
4काव्यानुशासनहेमचन्द्र 1964, श्री महावीर जैन विद्यालय, मुम्बई
5काव्यादर्शदण्डी
6काव्यालंकार सूत्रवृत्तिवामन व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर 1954, रामलालपुरी आत्माराम एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली – 6
7ध्वन्यालोकचौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी
8.काव्यप्रकाशआचार्य मम्मट, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी
9.नाट्य शास्त्रभरत, चौखम्भा प्रकाशन
10पुराण विमर्शबलदेव उपाध्याय, द्वितीय संस्करण 1978, चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी
11.पुराण पर्यालोचनम्डा० श्रीकृष्ण त्रिपाठी, प्रथम संस्करण 1976, चौखभा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
12.भविष्य पुराणखेमराज श्रीकृष्ण दास 1959, श्री वेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई
13.मार्कण्डेय पुराण- एकसांस्कृतिक अध्ययनडा० वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रथम संस्करण 1961, हिन्दुस्तानी ऐकेडमी, इलाहाबाद
14.महाभारतगीता प्रेस, गोरखपुर

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  1. रामायण : गीता प्रेस, गोरखपुर

  2. संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास : डा० कपिलदेव द्विवेदी, संस्कृत साहित्य संस्थान, इलाहाबाद

17 संस्कृत साहित्य का इतिहास : वाचस्पति गैरोला, 1960, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी

  1. संस्कृत साहित्य का इतिहास : ए०बी० कीथ, मङ्गलदेव शास्त्री 1959, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, पटना, वाराणसी

  2. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बलदेव उपाध्याय, संवत् 2030, वाराणसी

  3. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : रामजी उपाध्याय, विक्रमाब्द 2018, रामनारायण लाल वेणीमाधव, इलाहाबाद

  4. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बलदेव उपाध्याय 1953, शारदा मन्दिर, बनारस

  5. संस्कृत साहित्य की रूपरेखा : चन्द्रशेखर पाण्डेय, शान्तिकुमार नानूराम व्यास, पंचदश संस्करण 1982, साहित्य निकेतन, कानपुर

23 संस्कृत साहित्य का सुबोध इतिहास : डा० जयकिशन खण्डेलवाल 1970, रवीन्द्र प्रकाशन पाटनकर बाजार, ग्वालियर - 1

24 संस्कृत साहित्य का नवीन इतिहास : कृष्ण चैतन्य 1965, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी

  1. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक, इतिहास : डा० बाबूराम त्रिपाठी, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

  2. संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक, इतिहास : डा० सत्यनारायण पाण्डेय 1975, साहित्य भंडार, सुभाष बाजार, मेरठ

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  1. हिस्ट्री आफ संस्कृत लिट्रेचर : ए०ए० मैकडानल 1899

28 हिस्ट्री आफ संस्कृत लिट्रेचर : सुशील कुमार डे 1947, कलकत्ता युनिवर्सिटी प्रेस

  1. कहानी का रचना – विधान : डा० जगन्नाथ प्रसाद शर्मा 1975, हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी

  2. कथा के तत्व : डा० देवराज उपाध्याय

  3. आधुनिक संस्कृत साहित्य : डा० हीरालाल शुक्ल, प्रथम संस्करण 1971, रचना प्रकाशन, 45 ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद

  4. अग्नि पुराण : चौखम्भा प्रकाशन

33 शुकसप्तति. : चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, प्रथम संस्करण, संवत् 2023

  1. छन्दोलंकारसौरभवम् : अक्षयवट प्रकाशन, 26 बलरामपुर, हाउस, इलाहाबाद

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