श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ज्ञात्वेति । ज्ञात्वा देवम् 'अय- | 'ज्ञात्वा देवम्' इत्यादि । महमस्मि' इति, सर्वपाशापहानिः | परमात्माको जानकर अर्थात् 'यह मैं पाशरूपाणां सर्वेषामविद्यादीना- | हूँ' ऐसा अनुभव करके सम्पूर्ण मपहानिः । क्षीणैरविद्यादिभिः | पाशोंका नाश यानी पाशरूप सम्पूर्ण क्लेशैस्तत्कार्यभूतजन्ममृत्युप्रहाणि- | अविद्यादि क्लेशोंका नाश हो जाता र्जननमरणादिदुःखहेतुविनाशः । | है। तथा क्षीण हुए अविद्यादि क्लेशों- ज्ञानफलं प्रदर्शितम् । | के साथ ही उनके कार्यभूत जन्म- | मृत्यु आदिका नाश हो जाता है; | अर्थात् जन्म-मृत्यु आदि दुःखके | हेतुओंका अन्त हो जाता है। यह | ज्ञानका फल दिखाया गया । ध्याने किञ्चित्क्रममुक्तिरूपं | अब ध्यानमें क्रममुक्तिरूप कुछ विशेषमाह—तस्य परमेश्वरस्या- | विलक्षणता बतलायी जाती है— भिध्यानाद्देहभेदे शरीरपातोत्तर- | उस परमेश्वरके ध्यानसे देहभेद कालमर्चिरादिना देवयानपथा | यानी शरीरपातके अनन्तर अर्चिरादि गत्वा परमेश्वरसायुज्यं गतस्य | देवयानमार्गसे जाकर परमात्माके तृतीयं विराड्रूपापेक्षयाव्याकृत- | साथ सायुज्यको प्राप्त हुए पुरुषको परमव्योमकारणेश्वरावस्थं विश्वै- | विराट्रूपकी अपेक्षा अव्याकृत परम- श्वर्यलक्षणं फलं भवति । स | व्योमरूप कारणब्रह्ममें स्थित सम्पूर्ण तदनुभूय तत्रैव निर्विशेषमात्मानं | ऐश्वर्यरूप तृतीय फल प्राप्त होता ज्ञात्वा केवलो निरस्तसमस्तैश्वर्य- | है। उसका अनुभव कर वह उसी तदुपाधिसिद्धिरव्याकृतपरमव्योम- | जगह अपनेको निर्विशेष जानकर, कारणेश्वरात्मकतृतीयावस्थं वि- | केवल हो जाता है; अर्थात् सम्पूर्ण | ऐश्वर्य और उसके साथ रहनेवाली | सिद्धिको त्यागकर, यानी अव्याकृत | परमव्योममय कारण ईश्वररूप