भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦

[वाम भाग / Left Column] शरीरलघुता दीप्ति- जठराग्निविवर्धनम् । नादाभिव्यक्तिरित्येत- ल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ॥ शुष्यन्ति न जपैस्तेन स्पर्शशुद्धेरेहेतवः । प्राणायामं ततः कुर्या- द्रेचपूरककुम्भकैः ॥ प्राणापानसमायोगः प्राणायामः प्रकीर्तितः । प्रणवं त्र्यात्मकं गार्गि रेचपूरककुम्भकम् ॥ तदेतत्प्रणवं विद्धि तत्स्वरूपं ब्रवीम्यहम् । यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्तेषु प्रतिष्ठितः ॥ तयोरन्तं तु यद्गार्गि वर्गपञ्चकपञ्चमम् । रेचकं प्रथमं विद्धि द्वितीयं पूरकं विदुः ॥ तृतीयं कुम्भकं प्रोक्तं प्राणायामस्त्रिरात्मकः । त्रयाणां कारणं ब्रह्म भारूपं सर्वकारणम् ॥ रेचकः कुम्भको गार्गि सृष्टिस्थित्यात्मकावुभौ ।


[दक्षिण भाग / Right Column] शरीरका हल्कापन, कान्ति, जठराग्नि- की वृद्धि, नादका सुनायी देने लगना—ये सब नाडीशुद्धिकी सूचना देनेवाले चिह्न हैं। नाडियों- की शुद्धि जप करनेसे नहीं होती, अतः वह नाडीशुद्धिका हेतु नहीं है। "इसके पश्चात् रेचक, पूरक और कुम्भक क्रमसे प्राणायाम करे। प्राण और अपानका संयोग होना ही प्राणायाम कहलाता है। हे गार्गि! प्रणव त्रिरूप है। ये जो रेचक, पूरक और कुम्भक हैं इन्हें प्रणव ही समझो। मैं तुम्हें प्रणवका स्वरूप बतलाता हूँ। वेदके आदिमें जो स्वर (अ) है और जो स्वर (उ) वेदान्तोंमें स्थित है तथा इनके पीछे जो पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का पञ्चम वर्ण (म) है, इन [ओंकारकी तीन मात्रा अ, उ और म] में प्रथम वर्णको रेचक जानो, द्वितीयको पूरक समझा जाता है और तृतीयको कुम्भक बतलाया गया है। इस प्रकार यह तीन अङ्गोंवाला प्राणायाम है। इन तीनोंका कारण सभीका कारणरूप प्रकाशमय ब्रह्म है। हे गार्गि! रेचक और कुम्भक—ये दोनों तो क्रमशः सृष्टि और स्थिति-