भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

१४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

पूरकस्त्वथ संहारः | रूप हैं तथा पूरक संहाररूप है । कारणं योगिनामिह ॥ | इस प्रकार ये योगियोंकी उत्पत्त्यादि- पूरयेत्षोडशैर्मात्रै- | के कारण हैं । पहले षोडशमात्रां- रापादतलमस्तकम् । | क्रमसे पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चा- | पूरक करे । फिर खूब सावधानीसे द्रेचयेत्सुसमाहितः ॥ | बत्तीसमात्राक्रमसे रेचक करे और संपूर्णकुम्भबद्वायो- | हे गार्गि ! भरे हुए घड़ेके समान निश्चलं मूर्धदेशतः । | चौसठमात्राक्रमसे मूर्द्धदेशमें कुम्भक कुम्भकं धारणं गार्गि | करता हुआ वायुको निश्चलभावसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया ॥ | धारण करे । ऋषयस्तु वदन्त्यन्ये | "इसके सिवा हे सुन्दरि ! जिन्होंने प्राणायामपरायणाः । | भूत और आँतोंकी शुद्धि की है पवित्रभूताः पूतान्त्राः | ऐसे प्राणजयमें तत्पर कुछ अन्य प्रभञ्जनजये रताः ॥ | प्राणायामपरायण ऋषियोंका कहना तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा | है कि पहले चौसठमात्राक्रमसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया । | कुम्भक करके एक नासारन्ध्रसे रेचयेत्षोडशैर्मात्रै- | षोडशमात्राक्रमसे रेचक करे । र्नासेनैकैन सुन्दरि ॥ | इसके पश्चात् षोडशमात्राक्रमसे तयोश्च पूरयेद्वायुं | दोनों नासारन्ध्रोंमें वायु पूर्ण करे । शनैः षोडशमात्रया । | इस प्रकार प्राणजयी योगी प्राणसंयमको प्राणस्यायमनं त्वेवं | अपने अधीन कर ले । वशं कुर्याज्जयी वशी ॥ | पञ्च प्राणाः समाख्याता | "प्राण पाँच कहे गये हैं, वे वायवः प्राणमाश्रिताः । | प्राणके आश्रित पाँच दैहिक वायु | हैं । समस्त प्राणियोंके शरीरोंके प्राणो मुख्यतमस्तेषु | अन्तर्गत उन पाँच प्राण-वायुओंमें सर्वप्राणभृतां सदा ॥ | प्राण सबसे मुख्य है । वह प्राण