श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ नासिकारन्ध्रद्वारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरुष दुष्ट अश्वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियन्त्रण करे ॥९॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः | जिसकी चेष्टा “नात्यश्नतस्तु “नात्यश्नतः” (गी० ६।१६) | योगोऽस्ति”इत्यादिश्लोकमें बतलाये हुए इति श्लोकोक्तप्रकारेण संयुक्ता | नियमके अनुसार संयुक्त यानी संयत चेष्टा यस्य स संयुक्तचेष्टः। क्षीणे | है उसे संयुक्तचेष्ट कहते हैं। प्राणके शक्तिहान्या तनुत्वं गते मनसि | क्षीण होनेपर अर्थात् प्राणशक्तिका नासिकायाः पुटाभ्यां शनैः शनै- | ह्रास होनेसे मनके तनु हो जानेपर रुत्सृजेन्न मुखेन। वायुं प्रतिष्ठाप्य | नासिकारन्ध्रोके द्वारा धीरे-धीरे श्वास शनैर्नासिकयोत्सृजेदिति। उदा- | बाहर निकाले, मुखसे नहीं। तात्पर्य त्ताश्वयुतं रथनियन्तारमिव मननेन | यह है कि वायुको रोककर फिर उसे मनो धारयेताप्रमत्तः प्रणिहि- | धीरे-धीरे नासिकासे निकाले। फिर तात्मा ॥९॥ | अप्रमत्त—सावधान रहकर उद्धत | घोड़ोंवाले रथके सारथिके समान | मनको मनन करनेसे रोके ॥९॥ ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ जो समतल, पवित्र, शर्करा, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, मनके अनुकूल हो एवं नेत्रोंको पीड़ा देनेवाला न हो ऐसे गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें मनको युक्त करे ॥१०॥