श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ 𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍 विश्वतश्चक्षुरिति । सर्वप्राणि- | 'विश्वतश्चक्षुरत' इत्यादि । गतानि चक्षूंष्यस्येति विश्वत- | समस्त प्राणियोंके चक्षु इस परमात्मा- | के ही हैं, इसलिये यह विश्वतश्चक्षु श्चक्षुः । अतः स्वेच्छयैव सर्वत्र | है । अतः अपनी इच्छामात्रसे ही | इसमें सर्वत्र चक्षु यानी रूपादिको चक्षू रूपाद्यौ सामर्थ्यं विद्यत इति | ग्रहण करनेका सामर्थ्य है । इसी | प्रकार आगे [ विश्वतोमुखः आदि ] विश्वतश्चक्षुः । एवमुत्तरत्र योज- | में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिये । | वह दो भुजाओंद्वारा संयुक्त करता नीयम् । सं बाहुभ्यां धमति संयो- | है; धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं जयतीत्यर्थः; अनेकार्थत्वाद्धात्तू- | [ इसीसे अग्निसंयोगके अर्थमें प्रयुक्त | होनेवाले 'धमति' का अर्थ संयोजन नाम् । पक्षिणश्च धमति द्विपदो | लिया गया है ] । तथा पक्षियों और | दो पैरोंवाले मनुष्यादिको पंतत्रों मनुष्यादींश्च पतत्रैः । किं कुर्वन् ? | ( पंखों और पैरों ) से युक्त करता | है । क्या करता हुआ ? द्युलोक द्यावापृथिवी जनयन्देव एको | और पृथिवीकी सृष्टि करता हुआ । विराजं सृष्टवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | तात्पर्य यह है कि उस एकमात्र | देवने विराट्की रचना की ॥३॥ र्तयतीत्यर्थः ।” अर्थात् बाहु—विद्या और कर्मद्वारा तथा पतत्र-वासनाओंद्वारा संधमति—दीप्त करता है; अर्थात् जीवनिष्ठ विद्या और कर्मादिके द्वारा ईश्वर जगत्- को प्रवृत्त करता है। विज्ञानभगवान् कहते हैं—"बाहुभ्यां मनुष्यादीन्संधमति संयोजयति*** पतत्रैः पतनसाधनैः पादैः संधमति***अथवा पतत्रैः पक्षैः पक्षिणः संधमति ।” अर्थात् वह मनुष्यादिको भुजाओंसे युक्त करता है और पतत्र—चलनेके साधन यानी पैरोंसे युक्त करता है । अथवा पतत्र यानी पक्षोंसे पक्षियोंको युक्त करता है। १. 'पतत्र' शब्दका अर्थ है पतनसे बचानेवाला । अतः मनुष्योंके विषयमें इसका अर्थ पैर समझना चाहिये और पक्षियोंके विषयमें पक्ष ।