श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
उस [ पुरुषयुक्त जगत् ] से परे जो ब्रह्म-हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट एवं महान् है, जो समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरके अनुसार (परिच्छिन्नरूपसे) छिपा हुआ है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है उस परमेश्वरको जानकर जीवगण अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
[संस्कृत भाष्यम्] ततः परमिति । ततः पुरुष- युक्ताज्जगतः परं कारणत्वात्कार्य- भूतस्य प्रपञ्चस्य व्यापकमित्यर्थः । अथवा ततो जगदात्मनो विराजः परम् । किं तद्ब्रह्मपरं बृहन्तं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परं बृहन्तं महद्व्यापित्वात् । यथानिकायं यथाशरीरं सर्वभूतेषु गूढमन्तर- वस्थितं विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं सर्वमन्तः कृत्वा स्वात्मना सर्वं व्याप्यावस्थितमीशं परमेश्वरं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
[भाष्यार्थ] 'ततः परम्' इत्यादि । जो उससे यानी पुरुषयुक्त जगत्से परे है अर्थात् कारण होनेसे अपने कार्य- भूत जगत्में व्यापक है, अथवा जो उससे—जगद्रूप विराट्स परे है, वह क्या है ? इसके उत्तरमें श्रुति कहती है—ब्रह्मपरं बृहन्तम् । जो ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भरूप कार्यब्रह्म- से पर और व्यापक होनेके कारण बृहत्—महान् है। तथा जो समस्त प्राणियोंमें यथानिकाय—उनके शरीर- के अनुसार गूढ—अन्तःस्थित है, एवं विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है अर्थात् सबको अपने भीतर करके— अपने स्वरूपसे सबको व्याप्त करके स्थित है। उस ईश—परमेश्वरको जानकर जीव अमर हो जाते हैं ॥७॥