श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
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अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
स्येशानोऽमरणधर्मत्वस्य कैवल्य- | धर्मत्व यानी कैवल्यपदका भी प्रभु | है । तथा जो अन्नसे बढ़ता है, जो स्येशानः । यच्चान्नेनातिरोहति | विद्यमान है उसका यह स्वामी यद्वर्तते तस्येशानः ॥ १५ ॥ | है ॥ १५ ॥
पुनरपि निर्विशेषं प्रतिपाद- | फिर भी उसको निर्विशेष प्रति- यितुं दर्शयति— | पादन करनेके लिये श्रुति दिखलाती | है— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ उसके सब ओर हाथ-पाँव हैं, सब ओर आँख, शिर और मुख हैं तथा वह सर्वत्र कर्णोंवाला है एवं लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥ सर्वत इति । सर्वतः | 'सर्वतः' इत्यादि । उसके सब पाणयः पादाश्चेति सर्वतः- | ओर हाथ-पाँव हैं इसलिये वह सर्वतः- पाणिपादं तत् । सर्वतोऽक्षीणि | पाणिपाद है, तथा सब ओर आँख, शिरांसि मुखानि च यस्य तत्सर्व- | शिर और मुख हैं इसलिये सर्वतो- तोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिः | ऽक्षिशिरोमुख है । उसके सब ओर श्रवणमस्येति श्रुतिमत् । लोके | श्रुति-कर्ण हैं इसलिये वह सर्वतः प्राणिनिकाये सर्वमावृत्य संव्या- | श्रुतिमान् है । तथा यह लोकमें | अर्थात् प्राणिसमूहमें सबको आवृत प्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ | —व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥
आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रि- | उपाधिभूत पाणिपादादिके अध्या- याध्यारोपणाज्ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का | रोपसे ऐसी आशङ्का न हो जाय कि | ज्ञेय ( ब्रह्म ) उनसे युक्त है इसी मा भूदित्येवमर्थमुत्तरतो मन्त्रः— | प्रयोजनसे आगेका मन्त्र है—