श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ ब्रह्मका निर्विशेष रूप एवं तावत्सर्वात्मकं ब्रह्म प्रति- इसप्रकार यहाँतक ब्रह्मका सर्वात्म- पादितम् । इदानीं निर्विकारा- भावसे प्रतिपादन किया गया; अब नन्दस्वरूपेणानुदितानस्तमितज्ञा- अपने निर्विकार चिदानन्दस्वरूपसे तथा कभी उदित एवं अस्त न होनेवाले नात्मनावस्थितं परमात्मानं दर्श- ज्ञानस्वरूपसे स्थित परमात्माको यितुमाह— प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति कहती है— अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ वह हाथ-पाँवसे रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं है। उसे [ ऋषियोंने ] सबका आदि, पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥ अपाणिपाद इति । नास्य 'अपाणिपादः' इत्यादि । इसके पाणि और पाद नहीं हैं, इसलिये पाणिपादावित्यपाणिपादः । यह अपाणिपाद है । [ पैर जवनो दूरगामी । ग्रहीता पाण्य- न होनेपर भी ] जवन—दूरगामी है और ग्रहीता—हाथ न होने- भावेऽपि सर्वग्राही । पश्यति सर्व- पर भी सबको ग्रहण करनेवाला मचक्षुरपि सन् । शृणोत्यकर्णो- है। यह नेत्रहीन होनेपर भी सबको देखता है, कर्णहीन होनेपर भी ऽपि । स वेत्ति वेद्यं सर्वज्ञत्वाद- सुनता है और अमनस्क होनेपर भी मनस्कोऽपि । न च तस्यास्ति सर्वज्ञ होनेके कारण वेद्यवर्गको जानता है। किन्तु कोई उसे जाननेवाला वेत्ता “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” नहीं है, जैसा कि “इससे भिन्न