श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद- | उपलब्धकर [ मृत्युके पश्चात् ] इस मृता भवन्ति।” (के० उ० २।५) | लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं”, “अपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे | “[ जो परात्मविद्याको जानता है लोके ज्येये प्रतितिष्ठति” (के० | वह ] पापको त्यागकर विनाशरहित उ० ४।९) । “तन्मया अमृता वै | सुखमय स्वयं-प्रकाश परम महान् बभूवुः” (श्वेता० उ० ५।६) । | ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है”, “वे - “तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः | ब्रह्मस्वरूप होकर निश्चय ही अमर कृतार्थो भवते वीतशोकः” | हो गये”, “उस आत्मतत्त्वका (श्वेता० उ० २ । १४) । “य | साक्षात्कार कर कोई देहधारी जीव एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति” (बृ० | कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता उ० ४ । ४ । १४) । “ईशं तं | है”, “जो इसे जानते हैं, अमर हो ज्ञात्वामृता भवन्ति” (श्वेता० | जाते हैं”, “उस ईश्वरको जानकर उ० ३ । ७) । “तदेवोपयन्ति”। | अमर हो जाते हैं”, “उसीको प्राप्त “निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” | होते हैं”, “इसे अनुभव करके जीव (क० उ० १ । १ । १७)। “तमेवं | परमशान्ति प्राप्त करता है”, “उसे इस ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति” | प्रकार जानकर यह मृत्युके बन्धनोंको (श्वेता० उ० ४।१५) । “ये पूर्वं | काट देता है”, “पूर्वकालमें जिन देवा ऋषयश्च तं विदुः” (श्वेता० | देवता और ऋषियोंने उसे जाना उ० ५।६) । “तेषां शान्तिः शाश्वती | [ वे अमर हो गये ]” “[ अपनी नेतरेषाम्” (क० उ० २।२।१३)। | बुद्धिमें स्थित उन परमात्माको जो “बुद्धियुक्तो जहातीह | देखते हैं ] उन्हें ही नित्य शान्ति उभे सुकृतदुष्कृते ।” | प्राप्त होती है औरोंको नहीं।” (गीता २ । ५०) | “समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त “कर्मजं बुद्धियुक्ता हि | हुआ पुरुष [ ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा ] | पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें | त्याग देता है”, “समत्वबुद्धिसे युक्त