श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
उ० १ । ३ । १५) "एतद्यो | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता वेद निहितं गुहायां सोऽवि- | है, हे सोम्य ! वह अविद्यारूप द्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य" | ग्रन्थिको छिन्न-भिन्न कर देता है", (मु० उ० २ । १ । १०) । | "उस परावर ( ब्रह्मादि देवताओंसे "भिद्यते हृदयग्रन्थि- | भी उत्तम ) परमात्माका साक्षात्कार श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | कर लेनेपर इसके हृदयकी ग्रन्थि क्षीयन्ते चास्य कर्माणि | टूट जाती है, सारे संशय कट जाते तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥" | हैं तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते (मु० उ० २।२।८) | हैं", "जिस प्रकार नदियाँ बहती "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- | हुई अपने नाम और रूपको छोड़कर ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । | समुद्रमें लीन हो जाती हैं उसी तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः | प्रकार विद्वान् नाम और रूपसे मुक्त परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥" | होकर परसे भी पर दिव्य पुरुषको (मु० उ० ३।२।८) | प्राप्त हो जाता है", "वह, जो कि "स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म | उस परब्रह्मको जानता है, ब्रह्म ही हो वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० | जाता है", "हे सोम्य ! जो भी उस ३।२।९)। "स यो ह वै | छायाहीन, अशरीर, अलोहित, शुद्ध तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्र- | अक्षर ब्रह्मको जानता है [ वह सर्वज्ञ हो मक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य" | जाता है ]" "वह सब कुछ जानता (प्र० उ० ४।१०) । "स सर्व- | है", "उस जाननेयोग्य पुरुषको मवैति ।" "तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा | जान, जिससे मृत्यु तुझे व्यथित न मा वो मृत्युः परिव्यथाः" (प्र० | करे", "उस अवस्थामें एकत्व देखने- उ० ६ । ६) । "तत्र को मोहः | वाले पुरुषको क्या मोह और क्या कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" | शोक हो सकता है ?" "ज्ञानसे (ईशा० ७)। "विद्ययामृतमश्नुते" | अमरत्वको प्राप्त होता है", ईशा० ११) । "भूतेषु भूतेषु | "बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियोंमें