श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ऽनित्यत्वादिदर्शनेनोत्पन्नेहामु- | मुक्त और वस्तुओंका अनित्यत्वादि त्रार्थभोगविराग उपेत्याचार्यमा- | देखनेसे ऐहिक और पारलौकिक चार्यद्वारेण वेदान्तश्रवणादिनाहं | भोगोंसे विरक्त हो जाता है तब ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मतत्त्वमवगम्य | आचार्यके पास जाकर उनके द्वारा निवृत्ताज्ञानतत्कार्यो वीतशोको | वेदान्तश्रवणादि करके 'मैं ब्रह्म हूँ' भवति । अविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य | इस प्रकार ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार मोक्षस्य विद्याधीनत्वायुज्यते च | कर वह अज्ञान और उसके कार्यकी तदर्थोपनिषदारम्भः । | निवृत्ति हो जानेके कारण शोकरहित तथा तद्विज्ञानादमृतत्वम् । | हो जाता है । क्योंकि अज्ञाननिवृत्ति- आत्मज्ञानस्य "तमेवं विद्वान- | रूप मोक्ष ज्ञानके अधीन है, इसलिये माहात्म्यम् मृत इह भवति ।" | ज्ञान ही जिसका प्रयोजन है उस उप- ( नृसिंह पूर्व० १ । ६) "नान्यः | निषद्का आरम्भ करना उचित ही है । पन्था विद्यतेऽयनाय " ( श्वेता० | तथा उस (ब्रह्मात्मतत्त्व) के ज्ञानसे ६ । १५) । "न चेदि- | अमृतत्व प्राप्त होता है । "उसको हावेदीन्महती विनष्टिः" ( के० | जाननेवाला इस लोकमें अमृत (मुक्त) उ० २ । ५) । "य एतद्विदुर- | हो जाता है", "मोक्षप्राप्तिके लिये कोई मृतास्ते भवन्ति" (बृ० उ० ४ । | दूसरा मार्ग नहीं है", "यदि यहाँ ४ । १४) । "किमिच्छन्कस्य | उसे न जाना तो बड़ी भारी हानि कामाय शरीरमनु संज्वरेत्" (बृ० | है", "जो इसे जानते हैं अमर हो उ० ४ । ४ । १२) । "तं विदि- | जाते हैं", "[ यदि पुरुष 'यह त्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन।" | परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा जान ले (बृ० उ० ४ । ४ । २३) | तो वह ] क्या इच्छा करता हुआ "तरति शोकमात्मवित्" ( छा० | किस कामके लिये शरीरके पीछे सन्तप्त उ० ७ । १ । ३) । "निचाय्य | हो", "उसे जान लेनेपर जीव पाप- तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते।" (क० | कर्मसे लिप्त नहीं होता", "आत्मज्ञानी | शोकके पार हो जाता है," | "उसका अनुभव कर लेनेपर मृत्युके | मुखसे छूट जाता है", "इसे जो