श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ प्रथमोऽध्यायः सम्बन्ध-भाष्य श्वेताश्वतरोपनिषद इदं विवरण- | ब्रह्मतत्त्वके जिज्ञासुओंको सरलतासे ग्रन्थारम्भ- मल्पग्रन्थं ब्रह्मजि- | बोध करानेके लिये यह श्वेताश्वतरो- प्रयोजनम् ज्ञासूनां सुखाव- | पनिषद्की व्याख्या छोटे-से ग्रन्थके बोधायारभ्यते । चित्सदानन्दा- | रूपमें आरम्भ की जाती है । यद्यपि द्वितीयब्रह्मस्वरूपोऽप्यात्मा स्वा- | आत्मा सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म- श्रयया स्वविषययाविद्यया स्वानु- | स्वरूप ही है, तथापि अपने ही आश्रित भवगम्यया साभासया प्रति- | रहनेवाली, अपनेहीको विषय करने- बद्धस्वाभाविकाशेषपुरुषार्थः प्राप्ता- | वाली और [ 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार] शेषानर्थोऽविद्यापरिकल्पितैरेव सा- | अपने अनुभवसे ही ज्ञात होनेवाली धनैरिष्टप्राप्तिं चापुरुषार्थं पुरुषार्थं | चिदाभासयुक्त अविद्यासे उस मन्यमानो मोक्षार्थमलभमानो | (जीवात्मा) के सब प्रकारके स्वा- मकरादिभिरिव रागादिभिरितस्त- | भाविक पुरुषार्थका अवरोध हो जानेसे तः समाकृष्यमाणः सुरनरति- | उसे सम्पूर्ण अनर्थकी प्राप्ति हुई है और र्यगादिप्रभेदभेदितनानायोनिषु | वह अज्ञानवश कल्पना किये हुए ही संचरन्केनापि सुकृतकर्मणा ब्रा- | साधनोंसे अपनी इष्टप्राप्तिरूप अपुरुषार्थ- ह्मणाद्यधिकारिशरीरं प्राप्त ईश्वरार्थ- | को ही पुरुषार्थ मानकर परमपुरुषार्थरूप कर्मानुष्ठानेनापगतरागादिमलो- | मोक्षपद प्राप्त न कर सकनेके कारण | मकरादिके समान रागादि दोषोंसे | इधर-उधर खींचा जाकर देवता, | मनुष्य एवं तिर्यक् आदि विभिन्न | भेदोंसे युक्त अनेकों योनियोंमें | विचरता रहता है। जब किसी पुण्य- | कर्मके द्वारा ब्रह्मविद्याका अधिकारी | ब्राह्मणादि शरीर प्राप्तकर वह ईश्वरार्थ | कर्मानुष्ठान करनेसे रागादि मलोंसे