भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ फलंत्यक्त्वा मनीषिणः । | पुरुष कर्मजनित फल ( इष्टानिष्ट जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः | देहकी प्राप्ति) को त्यागकर ज्ञानी पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥” | हो जीते-जी जन्म-बन्धनसे मुक्त (गीता २।५१) | होकर समस्त उपद्रवोंसे रहित मोक्ष- “सर्वं ज्ञानप्लवेनैव | नामक परमपद प्राप्त करते हैं”, वृजिनं संतरिष्यसि ।” | “तू ज्ञानरूप नौकाके द्वारा ही “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | सम्पूर्ण पापोंके पार हो जायगा”, भस्मसात्कुरुते तथा ।” | “उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि (गीता ४।३६-३७) | सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म (निर्बीज) “एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्या- | कर देता है”, “हे भारत ! इस त्कृतकृत्यश्च भारत ।” | गुह्यतम शास्त्रको जानकर ही मनुष्य (गीता १५।२०) | बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है”, “ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा | “फिर मुझे तत्त्वतः जानकर तत्काल विशते तदनन्तरम् ।” | मुझहीमें प्रवेश कर जाता है”, “इन (गीता १८।५५) | सब साधनोंमें आत्मज्ञान ही उत्कृष्ट “सर्वेषामपि चैतेषा- | माना गया है तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें मात्मज्ञानं परं स्मृतम् । | भी वही सबसे बढ़कर है, क्योंकि तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां | उससे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। प्राप्यते ह्यमृतं यतः। | इसे प्राप्त कर लेनेपर ही द्विज कृत- प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि | कृत्य होता है, अन्य किसी प्रकार द्विजो भवति नान्यथा ॥ | नहीं। इस प्रकार जो मन-ही-मन एवं यः सर्वभूतेषु | सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको ही देखता पश्यत्यात्मानमात्मना । | है वह सबमें साम्यबुद्धिको प्राप्त करके स सर्वसमतामेत्य | सनातन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ | तथा सम्यग्दृष्टिसे सम्पन्न होनेके सम्यग्दर्शनसम्पन्नः | कारण वह कर्मोंसे बन्धनको प्राप्त कर्मभिर्न निबध्यते ।