श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
एवं श्रुतिस्मृतीतिहासादिषु ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वावगमा- द्युज्यत एवोपनिषदारम्भः । किंचोपनिषत्समाख्ययैव ज्ञान- स्यैव परमपुरुषार्थ- साधनत्वमव- गम्यते । तथा हि— उपनिषदित्युपनिपूर्वस्य सदेर्वि- शरणगत्यवसादनार्थस्य रूपमा- चक्षते । उपनिषच्छब्देन व्याचि- ख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवस्तुविषया विद्योच्यते । तादर्थ्याद्ग्रन्थोऽप्यु- पनिषत् । ये मुमुक्षवो दृष्टानु- श्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उप- निषच्छब्दितविद्यां तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषाम- विद्यादेः संसारबीजस्य विशरणा- द्दिनाशात्परब्रह्मगमयितृत्वाद्वर्भ- जन्मजरामरणाद्युपद्रवावसादयितृ-
(पार्श्व-टिप्पणी: उपनिषत्समाख्यायापि ज्ञानस्य परमपुरुषार्थसाधनत्वम्)
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
इस प्रकार श्रुति, स्मृति और इतिहासादिमें ज्ञान ही मोक्षका साधन जाना जाता है, अतः इस [ज्ञान-साधक] उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है । इसके सिवा उपनिषद् नामसे भी ज्ञानका ही परमपुरुषार्थमें साधन होना जाना जाता है । जाननेका प्रकार यह है—'उपनिषद्'—यह उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण, विनाश, गति और अवसादन (अन्त) अर्थवाले सद् धातुका रूप बतलाया जाता है । उपनिषद् शब्दसे, हम जिस ग्रन्थकी व्याख्या करना चाहते हैं उसके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तुको विषय करनेवाले ज्ञानका कथन होता है । उस ज्ञानकी प्राप्ति ही इसका प्रयोजन है इसलिये यह ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है । जो मोक्षकामी पुरुष दृष्ट और श्रुत विषयसे विरक्त हो उपनिषद् शब्दसे कही जानेवाली विद्याका निश्चयपूर्वक तत्परतासे अनुशीलन करते हैं उनकी संसारकी बीजभूता अविद्यादि- का विशरण—विनाश हो जानेके कारण, उन्हें परब्रह्मके पास ले जानेके कारण और उनके जन्म- मरणादि उपद्रवोंका अवसादन (अन्त)