श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 हंसः परमहंसश्च | पीछेवाला है वह-वह उत्तरोत्तर उत्तम यो यः पश्चात्स उत्तमः ॥" | है" ऐसी स्मृति भी है । उन इति स्मरणाच्च । तेभ्योऽत्या- | अत्याश्रिमियोंको उस प्रकृत परब्रह्मका श्रमिभ्यः परं प्रकृतं ब्रह्म तदेव | अर्थात् उस उत्कृष्टतम—सम्पूर्ण परमुत्कृष्टतमं निरस्तसमस्ता- | अविद्या और उसके कार्यसे रहित विद्यातत्कार्यनिरतिशयसुखैकरसं | निरतिशय-सुखैकरसस्वरूप पवित्र— पवित्रं शुद्धं प्रकृतिप्राकृतादिमल- | शुद्ध यानी प्रकृति और प्रकृतिके विनिर्मुक्तम् । ऋषिसंघजुष्टं वाम- | कार्य आदि मलसे रहित ब्रह्मका, देवसनकादीनां संघैः समूहैर्जुष्टं | जो ऋषिसंघजुष्ट यानी वामदेव एवं सेवितमात्मत्वेन सम्यक्परिभावितं | सनकादि ऋषियोंके समूहसे जुष्ट— प्रियतमानन्दत्वेनाश्रितम् । "आ- | सेवित अर्थात् आत्मभावसे सम्यक् त्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" | प्रकारसे भावना किया हुआ यानी (बृह० उ० ४ । ५ । ६) इति | प्रियतम आनन्दरूपसे आश्रित है, श्रुतेः । सम्यगात्मतयापरोक्षीकृतं | क्योंकि श्रुति भी कहती है "आत्मा- यथा भवति तथा । सम्यगित्यस्य | के लिये ही सब कुछ प्रिय होता काकाक्षिन्यायेनोभयत्रानुषङ्गः | है," [ अतः ऐसे ब्रह्मका ] जिस कर्तव्यः । प्रोवाचोक्तवान् ॥२१॥ | प्रकार वह आत्मस्वरूपसे पूर्णतया प्रत्यक्ष हो सके उस प्रकार उपदेश किया । श्रुतिके 'सम्यक्' पदका काकाक्षिन्यायसे 'प्रोवाच' और 'जुष्टम्' दोनों पदोंके साथ सम्बन्ध समझना चाहिये ॥२१॥ —----•----— अनधिकारिके प्रति विद्योपदेशका निषेध यथोक्तशिष्यपरीक्षणपूर्वकं | इस विद्याका उपर्युक्त प्रकारके | शिष्यकी परीक्षा करके उपदेश विद्या वक्तव्या तद्विहाय तदुक्तौ | करना चाहिये । उसे छोड़-