श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 276 में से
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वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत):
पितृलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) । “सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति” (छा० उ० २ । २३ । १) । “इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु० उ० १ । २ । १०) । “एवं कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः ।” “विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥” “एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते” (गीता ९ । २१) इति । यदा पुनः फलनिरपेक्षमीश्व- रार्थं कर्मानुतिष्ठन्ति तदा मोक्ष- साधनज्ञानसाधनान्तःकरणशुद्धि- साधनपारम्पर्येण मोक्षसाधनं भवति । तथाह भगवान्— “ब्रह्मण्याधाय कर्माणि
दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद):
पितृलोक प्राप्त होता है”, “ये सब पुण्यलोकोंके ही भागी होते हैं”, “इष्ट और पूर्तकर्मोंको ही सर्वश्रेष्ठ समझनेवाले मूढ़ पुरुष किसी अन्य श्रेयःसाधनको नहीं जानते; वे लोग स्वर्गलोकके उच्च स्थानमें अपने पुण्य- कर्मके उपभोगके लिये प्राप्त दिव्य देहमें पुण्यफल भोगकर इस मनुष्य- लोकमें या इससे भी निकृष्ट लोक (पशु-पक्षी आदि योनि अथवा नरक) में प्रवेश करते हैं”, “इस प्रकार जो कोई कर्मोंमें अनासक्त होते हैं वे ही पारदर्शी होते हैं”, “यह पुरुष ज्ञानस्वरूप है, यह कर्मप्रधान नहीं माना जाता”, “इस प्रकार त्रयीधर्म (केवल वैदिक कर्म) में तत्पर रहनेवाले सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं” इत्यादि । किन्तु जब कोई पुरुष फलकी इच्छा न रखकर केवल भगवान्के लिये ही कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं तो वे मोक्षके साधन ज्ञानकी साधन- भूता अन्तःकरण-शुद्धिके साधन होकर परम्परासे मोक्षके साधन होते हैं। ऐसा ही भगवान्ने कहा है— “जो पुरुष [ कर्मफलकी ] आसक्ति छोड़कर भगवान्के समर्पण-