श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ “अनेकजन्मंसंसार- “जबतक अनेकों जन्मके चिते पापसमुच्चये । सांसारिक संसर्गसे सञ्चित हुआ नाक्षीणे जायते पुंसां पापपुञ्ज क्षीण नहीं होता तबतक गोविन्दाभिमुखी मतिः॥” लोगोंकी बुद्धि भगवान्की ओर प्रवृत्त “जन्मान्तरसहस्रेषु नहीं होती ।” “हजारों जन्मोंके तपोज्ञानसमाधिभिः । पीछे तपस्या, ज्ञान और समाधिके नराणां क्षीणपापानां द्वारा जिनके पाप क्षीण हो गये हैं कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” उन्हीं लोगोंकी भगवान् कृष्णमें भक्ति “पापकर्मशयो ह्यत्र होती है ।” “इस लोकमें पापकर्मोंका महामुक्तिविरोधकृत् । संस्कार ही आत्यन्तिकी मुक्तिका तस्यैव शमने यत्नः विरोधी है; अतः संसारसे डरनेवाले कार्यः संसारभीरुणा ॥” पुरुषको उसीके नाशका प्रयत्न “सुवर्णादिमहादान- करना चाहिये ।” “सुवर्णदानादि पुण्यतीर्थावगाहनैः । बड़े-बड़े दानोंसे, पवित्र तीर्थोंमें शारीरैश्च महाक्लेशैः स्नान करनेसे और शास्त्रानुकूल शास्त्रोक्तैस्तच्छमो भवेत् ॥” शारीरिक महान् कष्टोंके सहनसे “देवताश्रुतिसच्छास्त्र- उसका नाश हो सकता है ।” श्रवणैः पुण्यदर्शनैः । “देवाराधन, श्रुति और सच्छास्त्रोंके गुरुशुश्रूषणैश्चैव श्रवण, पवित्र तीर्थस्थानोंके दर्शन पापबन्धः प्रशाम्यति ॥” और गुरुकी सेवा करनेसे भी पापका याज्ञवल्क्योऽपि शुद्धयपेक्षां बन्धन निवृत्त हो जाता है ।” तत्साधनं च दर्शयति— याज्ञवल्क्यजी भी ज्ञानमें चित्त- “कर्त्तव्याशयशुद्धिस्तु शुद्धिकी अपेक्षा और उसके साधन भिक्षुकेण विशेषतः । प्रदर्शित करते हैं— “ज्ञानोत्पत्तिका ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वा- हेतु होनेसे भिक्षुको स्वतन्त्रता (मुक्ति) त्स्वतन्त्रीकरणाय च ॥ प्राप्त करनेके लिये विशेषरूपसे ( याज्ञ० यतिधर्म० ६२) चित्तकी शुद्धि ही करनी चाहिये । मलिनो हि यथादर्शो जिस प्रकार मलिन दर्पणमें अपना रूपालोकस्य न क्षमः । रूप नहीं देखा जा सकता उसी