भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १७

तथाविपक्वकरण | प्रकार जिसका अन्तःकरण परिपक्व आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥” | (वासनारहित) नहीं है वह आत्म- (याज्ञ० यतिधर्म० १४१) | ज्ञान प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं “आचार्योपासनं वेद- | रखता।” [अब चित्तशुद्धिके साधन शास्त्रार्थस्य विवेकिता । | बतलाते हैं-] “गुरुसेवा, वेद और सत्कर्मणामनुष्ठानं | शास्त्रके तात्पर्य का विवेचन, शुभकर्मों- सङ्गः सद्भिर्गिरः शुभाः ॥ | का आचरण, सत्पुरुषोंका संग, अच्छी स्त्र्यालोकालम्भविगमः | वाणी बोलना, स्त्रीमात्रके दर्शन और सर्वभूतात्मदर्शनम् । | स्पर्शका त्याग, समस्त प्राणियोंमें त्यागः परिग्रहाणां च | आत्मदृष्टि करना, परिग्रहका त्याग, जीर्णकाषायधारणम् ॥ | पुराने काषाय वस्त्र धारण करना, विषयेन्द्रियसंरोध- | विषयोंकी ओरसे इन्द्रियोंको रोकना, स्तन्द्रालस्यविवर्जनम्। | तन्द्रा और आलस्यको त्यागना, शरीरपरिसंख्यानं | देहतत्त्वका विचार, प्रवृत्तिमें दोष- प्रवृत्तिष्वघदर्शनम् ॥ | दर्शन, रजोगुण और तमोगुणके नीरजस्तमसा सत्त्व- | त्यागद्वारा सत्त्वगुणको बढ़ाना, किसी शुद्धिर्निःस्पृहता शमः । | प्रकारकी इच्छा न करना और एतैरुपायैः संशुद्ध- | मनोनिग्रह-इन उपायोंके द्वारा सत्त्वयोग्यमृती भवेत् ॥” | जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया (याज्ञ० यतिधर्म० १५६-१५९) | है वह योगी अमृतत्व (मोक्ष) को “यतो वेदाः पुराणानि | प्राप्त हो जाता है” “वेद, विद्योपनिषदस्तथा । | पुराण, ज्ञानमय उपनिषद्, श्लोक, श्लोकाः सूत्राणि भाष्याणि | सूत्र, भाष्य तथा और भी जहाँ-कहीं

१. भाष्यका लक्षण इस प्रकार बताया गया है— सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥ जिसमें कि सूत्रके पदोंको लेकर तदनुकूल अन्य पद

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