श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ यच्चान्यद्वाङ्मयं क्वचित् ॥ वेदानुवचनं यज्ञो ब्रह्मचर्यं तपो दमः । श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य- मात्मनो ज्ञानहेतवः ॥" (याज्ञ० यति० १८९-१९०) तथा चाथर्वणे विशुद्धद्यपेक्ष- मात्मज्ञानं दर्शयति- "जन्मान्तरसहस्रेषु यदा क्षीणास्तु किल्बिषाः ॥ तदा पश्यन्ति योगेन संसारोच्छेदनं महत् ॥” (योगशिख० १ । ७८-७९) “यस्मिन्विशुद्धे विरजे च चित्ते य आत्मवत्पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।” "तमेतं वेदानु- वचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन" (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति बृहदारण्यके विविदिषाहेतुत्वं यज्ञादीनां दर्शयति । जो कुछ शास्त्र हैं वे सब एवं वेदपाठ, यज्ञानुष्ठान, ब्रह्मचर्य, तप, इन्द्रियदमन, श्रद्धा, उपवास और स्वतन्त्रता (दूसरे किसीकी आशा न रखना) ये सब आत्मज्ञानके साधन हैं।" इसी प्रकार अथर्ववेदीय उपनिषद्में भी 'आत्मज्ञान चित्तशुद्धिकी अपेक्षा रखनेवाला है' यह दिखलाते हैं- "जिस समय सहस्रों जन्मोंके अनन्तर पाप क्षीण हो जाते हैं उसी समय पुरुष योगके द्वारा संसारका उच्छेद करनेवाला [ज्ञानरूप] महान् साधन देख पाते हैं।" "जिस चित्तके शुद्ध और निर्मल हो जानेपर जिनके दोष क्षीण हो गये हैं वे यतिजन सम्पूर्ण भूतोंको आत्मस्वरूप ही देखते हैं।" बृहदारण्यकमें भी “उस इस आत्माको ब्राह्मणगण वेद- पाठ, यज्ञ, दान, तप और उपवासके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं” इस वाक्यद्वारा श्रुति यज्ञादिको जिज्ञासाका हेतु प्रदर्शित करती है । वाचक शब्द] और कुछ स्वाभिमत पद रहते हैं उसे भाष्यका लक्षण जाननेवाले 'भाष्य' मानते हैं ।