भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९

ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान) कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" | और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ० ११)। | साथ-साथ जानता है", "तप और "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेय- | ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट सकरं परम्।" इत्यादिना कर्मणाम- | साधन हैं" इत्यादि वाक्योंसे तो प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । | कर्मोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमें हेतु होना जान पड़ता है ? सत्यम्, अवगम्यत एव तद- | सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो तच्च तदपे-पेक्षितशुद्धिद्वारेण न | पड़ता ही है; परन्तु ज्ञानके लिये क्षितशुद्धिद्वारेण च साक्षात् । तथा | अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां | अमृतत्वमें हेतुत्व है, साक्षात् नहीं। च" (ईशा० उ० ११) । "तपो | इसीसे "विद्यां चाविद्यां च" तथा विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।" इत्यादिना ज्ञानकर्मणोर्निः- | परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमें हेतुत्व बतलाकर स्तद्धेतुत्वमित्याकाङ्क्षायां "तपसा | ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" | प्रकार उसके हेतु हैं- "तपसा कल्मषं "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया- | हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) | "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृत- इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- | मश्नुते"† इन वाक्यशेषोंसे कर्मका क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- | पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु | अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया शुद्ध्याद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- | है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- | अन्य कर्मोंका उपदेश दिखायी न दे वहाँ भी शाखान्तरोपसंहारन्यायसे‡

  • तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । † कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । ‡ जहाँ एक ही जातिके कर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न शाखाओंमें वर्णन