भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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[Header] २० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

पसंहारः कर्त्तव्यः । | उसका उपसंहार (संग्रह) कर लेना चाहिये । ननु "कुर्वन्नेवेह कर्माणि | पूर्व०-किन्तु "कर्म करते हुए [विद्याया मोक्षसाधनत्व-माक्षिपति] जिजीविषेच्छतं | ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी समाः” (ईशा० उ० | इच्छा करे” ऐसा जीवनपर्यन्त २) इति यावज्जीवकर्मानुष्ठाननियमे | कर्मानुष्ठानका नियम रहते हुए ज्ञान सति कथं विद्याया मोक्षसाधनत्वम् ? | मोक्षका साधन कैसे माना जा सकता है ? उच्यते—कर्मण्यधिकृतस्यायं | सिद्धान्ती-बतलाते हैं, यह [आक्षेपं परिहरति] नियमो नानधिकृत- | नियम कर्माधिकारीके ही लिये है, जो कर्मके अधिकार और शास्त्राज्ञासे स्यानियोज्यस्य ब्रह्मवादिनः । तथा | बाहर है उस ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं च विदुषः कर्मानधिकारं दर्शयति | है ! इसी प्रकार श्रुति भी ब्रह्मवेत्ताको कर्मके अधिकारसे बाहर दिखाती है- श्रुतिः—"नैतद्विद्वानृषिणा विधेयो | "यह ब्रह्मवेत्ता ऋषियोंकी आज्ञाके न रुध्यते विधिना शब्दचारः ।” | अधीन नहीं है और न यह शास्त्रका "एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसो- | अनुयायी होकर उसकी आज्ञासे रुक ऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे ।” “एतं | ही सकता है," "इसीलिये पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे,” वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः | “इस आत्मतत्त्वको जान लेनेपर पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकै- | ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा और षणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं | लोकैषणाको छोड़कर भिक्षाचर्या

[Footnote] हो, किन्तु शास्त्रभेदसे उनके फल या अनुष्ठानकी शैलीमें भेद दिखायी दे वहाँ अन्य शाखामें आये हुए अधिक अंशको सम्मिलित करके न्यूनताकी पूर्ति कर लेनी चाहिये । इसे शाखान्तरोपसंहारन्याय कहते हैं। इसका विशद वर्णन ब्रह्मसूत्रभाष्यके तृतीय अध्यायके तृतीय पादमें देखना चाहिये ।