श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया | “इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर वह द्वारा प्रापद्यत” (ऐत० उ० १ । ३ । | इसीके द्वारा शरीरमें प्रवेश कर गया”, १२) । “स एष इह प्रविष्ट आन- | “वह नखके अग्रभागसे लेकर शिखा- खाग्रेभ्यः” (बृ० उ० १ । ४ । | तक इस शरीरमें प्रवेश किये हुए है”, ७) । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- | “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट शत्” (तैत्ति० उ० २ । ६ । १) | हो गया” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इत्यादिना परस्यैव ब्रह्मण उपा- | परब्रह्मको ही उपाधिकी प्राप्ति धियोगं दर्शयित्वा निर्विशेषमेव | दिखलाकर इस प्रकार उपसंहार ब्रह्म । भेदस्तु जलसूर्यादिवदौ- | किया है कि ब्रह्म निर्विशेष ही है; पाधिको मायानिबन्धन इत्युप- | उसका जो मायाजनित भेद है वह संहृतवान् । | जल-सूर्यादिके समान उपाधिके | कारण है । किञ्च ब्रह्मविदामनुभवोऽपि | इसके सिवा ब्रह्मवेत्ताओंका [प्रपञ्चस्य] प्रपञ्चस्य बाधकः । | अनुभव भी प्रपञ्चका बाधक है, [बाधितत्वे] तेषां निष्प्रपञ्चात्म- | क्योंकि उन्हें निष्प्रपञ्च आत्माका [ब्रह्मविदनुभव-] दर्शनस्य विद्यमान- | अनुभव रहता है । ऐसा ही यह [प्रदर्शनम्] त्वात् । तथा हि | श्रुति उनका अनुभव प्रदर्शित करती तेषामनुभवं दर्शयति । “यस्मिन् | है—“जिस स्थितिमें ज्ञानीको सब सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभू- | भूत आत्मा ही हो जाते हैं, उसमें द्विजानतः । तत्र को मोहः | उस एकत्वदर्शीके लिये क्या शोक कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” | और क्या मोह हो सकता है ?” (ई० उ० ७) । “विदिते वेद्यं | “बोध हो जानेपर कोई ज्ञेय नहीं नास्ति” इति । एवं निर्वाणमनु- | रहता” इत्यादि । इसी प्रकार शासनम् । “यत्र वा अन्यदिव | निर्वाणका भी उपदेश किया है— स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्” (बृ० | “जहाँ अन्य-सा हो वहाँ अन्य उ० ४ । ३ । ३१) । “यत्र | अन्यको देखे,” किन्तु “जिस त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं | स्थितिमें इसे सब आत्मा ही हो गया पश्येत्” (बृ० उ० ४ । ५ । १५)। | है उसमें किससे किसे देखे ?” ˙ श्वेता० ३—