भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ]

चलने चलति जलभेदे भिद्यत | पर घटता, जलके चलनेपर चलता इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति | और जलका भेद होनेपर भिन्न-सा न तु परमार्थतः सूर्यस्य तत्त्व- | हो जाता है, इस प्रकार वह जलके मस्ति । एवं परमार्थतोऽविकृत- | धर्मोका अनुकरण करता है, परमार्थतः मेकरूपमपि सद्ब्रह्म देहाद्युपाध्य- | सूर्यमें वे विकार वास्तविक नहीं न्तर्भावाद्भवत एवोपाधिधर्मान्वृ- | होते, उसी प्रकार परमार्थतः द्विह्रासादीनिति विवक्षितांशप्रति- | अविकारी और एकरूप होनेपर भी पादनेन दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | ब्रह्म देहादि उपाधियोंके अन्तर्गत सामञ्जस्यमुक्त्वा "दर्शनाच्च" | रहनेसे उन उपाधियोंके वृद्धि-ह्रासादि (ब्र० सू० ३।२।२१) इति | धर्मोको ग्रहण करता ही है—इस "पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः | प्रकार विवक्षित अंशके प्रतिपादनसे पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य आविशत्" (बृ० उ० २।५। | बतलाकर "दर्शनाच्च" इस सूत्रांशसे १८) । "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप | "परमपुरुषने दो चरणोंवाला पुर(शरीर) ईयते" (बृ० उ० २।५। | बनाया, चार पैरोंवाला पुर बनाया १९) । "मायां तु प्रकृतिं | और वह पक्षी होकर उन पुरोंमें विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" | प्रवेश कर गया", "इन्द्र मायाद्वारा (श्वेता० उ० ४।१०) । "मायी | अनेक रूपवाला हो जाता है", सृजते विश्वमेतत्" (श्वेता० उ० | "मायाको प्रकृति जानो और ४।९) । "एकस्तथा सर्वभूता- | मायावीको महेश्वर", "मायावी इस न्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो | विश्वकी रचना करता है", "उसी बहिश्च" (क० उ० २।२।९। | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही १०) । "एको देवः सर्वभूतेषु | अन्तरात्मा भिन्न-भिन्न रूपोंके अनुरूप गूढः" (श्वेता० उ० ६।११) । | हो गया है", "समस्त भूतोंमें | एक ही देव छिपा हुआ है",

१. श्रुतियाँ भी देहादि उपाधियोंमें ब्रह्मका अनुप्रवेश दिखलाती हैं ।