भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१


इति दृष्टान्तबलेनापि निर्वि- | इस प्रकार दृष्टान्तके बलसे भी शेषमेव ब्रह्मेत्युपपाद्य "अम्बुवद- | यही सिद्ध करके कि ब्रह्म निर्विशेष ग्रहणात्" (ब्र० सू० ३।२।१९) | ही है "अम्बुवद्ग्रहणात्तु न तथा- इत्यात्मनोऽमूर्त्तत्वेन सर्वगतत्वेन | त्त्वम्" इस सूत्रसे यह आशंका की जलसूर्यादिवन्मूर्त्तसंभिन्नदेशस्थि- | है कि आत्मा अमूर्त्त और सर्वगत है; तत्वाभावाददृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | अतः जल-सूर्यादिके समान उसका सादृश्यं नास्तीत्याशङ्क्य "वृद्धि- | मूर्त्तरूपसे किसी देशविशेषमें स्थित हासभाक्त्वम्" (ब्र० सू० ३। | होना सम्भव न होनेके कारण इन २।२०) इति न हि दृष्टान्त- | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकोंकी समता दार्ष्टान्तिकयोर्विवक्षितांशमुक्त्वा | नहीं है। इसपर "वृद्धिहासभाक्त्व- सर्वसारूप्यं केनचिद्दर्शयितुं श- | मन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्" इस क्यते। सर्वसारूप्ये दृष्टान्तदार्ष्टा- | सूत्रसे यह दिखलाया है कि विवक्षित न्तिकभावोच्छेद एव स्यात्। | अंशको छोड़कर दृष्टान्त और वृद्धिहासभाक्त्वमत्र विवक्षितम्। | दार्ष्टान्तिककी सर्वांशमें समानता जलगतसूर्यप्रतिविम्बं जलवृद्धौ | कोई भी नहीं दिखला सकता। यदि वर्धते जलह्रासे च हसति जल- | सर्वांशमें समानता हो जायगी तो | उनका दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिक भाव ही | नहीं रहेगा। यहाँ ( जलसूर्यादि | दृष्टान्तमें ) तो उनका वृद्धिहासयुक्त | होना ही विवक्षित है। जिस प्रकार | जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब | जलके बढ़नेपर बढ़ता, जलके घटने-


१. सूर्यसे भिन्न जलके समान सविशेष ब्रह्मकी उपाधि उससे भिन्न गृहीत न होनेके कारण सूर्यके प्रतिबिम्बसे उसकी उपमा नहीं दी जा सकती। २. जिस प्रकार सूर्यप्रतिविम्ब जलकी वृद्धि और ह्रास होनेपर स्वयं भी वृद्धि और ह्रासका भागी होता है उसी प्रकार आत्मा वास्तवमें अविकारी और एकरूप होनेपर भी देहादि उपाधियोंके अन्तर्भूत होकर उनके वृद्धि और ह्रासका भागी होता है। इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्त दोनोंमें सामञ्जस्य होनेके कारण कोई विरोध नहीं है।