भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३३ )

कामकंदलासे कहा कि-महाराज ! तुमने तो श्रम बहुत किया अब चलकर आराम कीजिये. यह कह माधवको रंगमहलमें ले गई और जितनी खुशी थी सो सब की, जब की. जब सुबह हुआ तब दोनोंके जीमें राजाकी बात याद आई और सुध बुध जाती रही. तब घबराकर माधवने कहा कि-सुन सुंदरी ! रात तो आनंदमें कटी और अब जो मे यहां रहूंगा तो दोनोंके प्राण जाँयगे इसवास्ते अब कुछ यत्न कीजिये, जिससे निर्द्वंद्व आनंदमें रहेंगे. मैंने एक बात जीमें विचारी है. अब मे यहांसे पहले जाउँ और कुछ उपाय कर फिर आकर तुझेभी यहांसे ले जाऊंगा. तू अपना जी मजबूतसे रखना. मैं जरूर आकार तुझसे मिलूँगा. यह बचन मैं तुझे देकर जाताहूं इतनी बातें सुनतेही वह तो मूर्च्छा खाके गिर पड़ी और माधवने उठकर राह ली. और वहांसे निकलके वन वन फिरने लगा. और हाय कामकंदला ! हाय कामकंदला ! करने लगा. इधर उसेभी सखियोंने गुलाबका नीर छिड़ककर उठाया. जब कुछ होश आया तब वह भी माधव माधव पुकारने लगी और खाना पीना सब त्याग किया बहुतेरा सखियों समझाती थीं पर उसके जीमें एक न आती थी. ज्यों ज्यों गुलाब वा कपुर चंदन लालाकर लगाती थीं, त्यों त्यों दाह चौगुनी बढतीथी. किसी तरहसे शीतलता न होती थी. जब कोई माधवका नाम और गुण सुनाताथा तभी