भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

२ स्पन्दकारिका मध्याह्न के प्रखर सहस्रकिरण को क्या प्रकाश दे सकता है ? तथापि मन में इस बात का पूर्ण विश्वास है कि इसको देखकर कम से कम उनके मन में निराशा के भाव का उदय नहीं होगा क्योंकि वर्तमान युग के चतुर्दिक् क्षुब्ध वातावरण में, मानवमात्र को हार्दिक शान्ति प्रदान करनेवाली, इस भारतीय पूर्वजों की थाती को आगे बढ़ाने की दिशा में, जितना भी और जो कुछ भी किया जाये बहुत कम है। फलतः यदि उल्लिखित बन्धुवर्ग को प्रस्तुत प्रयास के द्वारा अल्पमात्रा में भी हार्दिक संतोष प्राप्त होगा तो वह पारमेश्वर शक्तिपात का हो अलौकिक चमत्कार समझा जायेगा। स्पन्द-सूत्रों का वर्ण्य विषय सततस्पन्दमयी पारमेश्वरी विमर्शशक्ति होने के कारण, प्रस्तुत अनुवाद-कार्य ईश्वराश्रम में रहनेवाली तपस्विनी भगवती शारिकादेवी के ही एक जन्म- दिवस पर आरम्भ करके, दो वर्षों के पश्चात् आनेवाले दूसरे जन्मदिवस के अवसर पर, समाप्त भी किया गया। इस पुनीत दिवस पर जहां आश्रम में आनेवाले भक्तजन, भगवती के सामने स्वादिष्ट मिष्ठान्नों के ढेरों के ढेर एकत्रित कर लेते हैं, वहाँ किसी रिक्त कोने में अकिञ्चन की यह तुच्छ भेंट भी शायद अपना स्थान बनाने से सफल होगी। यहाँ पर पाठकों की उत्सुकता को शान्त करने के लिये भगवती शारिकादेवी का परिचय देना आवश्यक है। त्याग और तपस्या की साक्षात् मूर्ति भगवती शारिकादेवी श्रीसद्- गुरुमहाराज की मुख्य शिष्या हैं। जन्म १९१४ की मार्ग शुक्ल द्वितीया को एक समृद्धिशाली कश्मीरी पण्डित घराने में हुआ। पिता का नाम श्री जियालाल सोपोरी और माता का नाम सुश्री राधिकरानी था। आप में जन्मकाल से ही आध्यात्मिक भावनायें प्रस्फुटित थीं अतः आपने सांसारिक प्रलोभनों के बन्धनों में फँसना स्वीकार नहीं किया। केवल पंद्रह वर्ष की अवस्था ही में आपको सद्गुरुमहाराज से दीक्षा मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तब से ही आपने अपने अत्यन्त कठिन त्यागमय और साधनामय जीवन का लक्ष्य स्वरूपलाभ ही बनाया है। बाह्य-जगत् के क्षुब्ध एवं कोलाहलपूर्ण वातावरण में भी, आप प्रतिसमय मौन एवं शान्त रहकर, तन-मन से गुरुभक्ति एवं परमार्थ-विचार में ही लीन रहती हैं। स्पन्द-सम्प्रदाय कश्मीर के सभी शैवक्षेत्रों में, प्राचीनकाल से ही चली आ रही एक जनश्रुति के अनु- सार, नवीं शताब्दी ईसा से पहले की कई शताब्दियाँ, यहाँ के दार्शनिक संसार का अंधकार- युग माना जाता है। इस समय में नागबोधि जैसे प्रचण्ड बौद्ध आचार्यों और अन्य मताव- लम्बियों ने, यहाँ के दार्शनिक क्षेत्रमें द्वैत-मूलक सिद्धान्तों की स्थापना करके, सर्वसाधारण जनता को वास्तविकता से बहुत दूर ले जाकर, भ्रान्ति के गड्ढे में ढकेल दिया था। ऐसी अवस्था में पड़े हुए लोगों का उद्धार करने की इच्छा से, अनुग्रहैकमूर्ति भगवान् भूतनाथ ने, वसुगुप्त नामक सिद्ध को स्वप्नदशा में स्वयं दीक्षित करके, महादेव पर्वत की तलहटी (वर्तमान दाछीगाम) में विद्यमान एक उपल (वर्तमान शङ्कर-पल) पर उत्कीर्ण, अद्वैत शैव-सिद्धान्त के सूत्रों का पता बता दिया और उनमें अन्तर्निहित रहस्य को भी समझा दिया। साथ ही यह आदेश भी दिया कि वह वहाँ से उन सूत्रों का संग्रह करके, उनमें निहित रहस्य को अन्धकारा-