भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 190 में से

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पृष्ठ 168

१५८ स्पन्दकारिका भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरत्यतः । संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥५०॥ भुङ्क्ते अश्नाति, अस्वतन्त्रो भोगं सुखदुःखसंवेदनरूपं, तस्य पुर्यष्टकस्य भावात् संसरति संसारशरीरे, अतः संसृति-प्रलयस्य जन्ममरणप्रवाहरूपस्य संसारस्य विनाश- कारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥५०॥ अनुवाद सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप- स्थूल, तथा मनस्, अहंकार और बुद्धि इनके द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही 'प्रत्ययोद्भव' को जन्म मिलता है। फलतः ॥४९॥ (वह) परवश बनकर सांसारिक भोगों को भोगता है। पुर्यष्टक की विद्यमानता से ही बार बार जन्मता और मरता है। इसलिये संसृति के बखेड़े को एक बार ही मिटा देने वाले कारण (उपाय) का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ वृत्ति—'तन्मात्रोदयः' इस शब्द के दो खण्ड हैं—'(१) तन्मात्र और तन्मात्रोदय (क्रमशः सूक्ष्मपुर्यष्टक और स्थूल-पुर्यष्टक)। इसका अभिप्राय यह कि (पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) शब्द आदि तन्मात्रों की अनुभूति के ही रूपवाले और मनस्, अहंकार और बुद्धि इन तीनों के द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन-में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही सुखात्मक या दुःखात्मक संवेदना को जन्म मिलता है। फलतः—॥४९॥ (वह) अस्वतन्त्र बनकर, सुख और दुःख की संवेदना के रूपवाले भोगों को भोगता है। उस (पुर्यष्टक की विद्यमानता से संसार-शरीर में (पाञ्चभौतिक काया में) संसरण करता है। अतः संसृति के नाश का अर्थात् जन्म-मरण के प्रवाहरूप संसार का नाश करने वाले कारण का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित तन्मात्र, पुर्यष्टक इत्यादि शास्त्रीय शब्दों का आंशिक पर्यालोचन भी कुछेक स्थानों पर किया गया है। कुछ बातें रह गई हैं। अतः यहाँ पर इन बातों का संक्षिप्त परन्तु यथासम्भव सर्वाङ्गीण विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक है क्योंकि तभी सूत्र का अभिप्राय समझने में सुगमता होगी। संसार में प्रत्येक प्राणी की काया के दो रूप होते हैं-(१) सूक्ष्म शरीर और (२) स्थूल शरीर। इनमें से सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर का कारणरूप और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर का कार्यरूप होता है। सूक्ष्म-शरीर त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके द्वारा १संवेद्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच सूक्ष्म तन्मात्रों के योग १. एषां ग्राह्यो विषयः सूक्ष्मः प्रविभागवर्जितो यः स्यात् । तन्मात्रपञ्चकं तत् शब्दः स्पर्शो महो रसो गन्धः । (द्र० सा०, २१)