भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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३२ स्पन्दकारिका भी सकते हैं। फलतः तीन अन्तःकरणों और पांच बाह्य ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से, १निश्चय, अभिमान, संकल्प, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के रूप में उत्पन्न सर्वसाधारण ज्ञान को, 'जाग्रत् अवस्था' कहते हैं। इसमें सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। २. स्वप्न-अवस्था—२इस अवस्था में प्रमाता के इन्द्रियवर्ग का बाह्यप्रसार रुक जाता है और परिणामतः उनकी निश्चयन, अभिमानन, शब्दन, स्पर्शन इत्यादि सारी वृत्तियां केवल मानसिक संकल्पविकल्पात्मकता में ही केन्द्रीभूत हो जाती हैं। फलतः इस अवस्था में प्रमाता जाग्रत्-अवस्था की तरह ही नगर, गिरि, उपवन इत्यादि पदार्थों का अनुभव मानसिक विकल्पों के द्वारा करने लगता है। इस अवस्था का जाग्रत्-अवस्था के साथ केवल इतना भेद है कि इसमें अनुभूयमान पदार्थवर्ग एक ओर क्षणपर्यवसायी होता है और दूसरी ओर स्वप्नावस्था में पड़े हुए प्रमाता के अतिरिक्त दूसरे प्रमाता उसको ग्रहण नहीं कर सकते हैं। फलतः केवल मानसिक संकल्पविकल्पात्मकता के द्वारा विषयों के अनुभव करने की अवस्था को 'स्वप्नावस्था' कहते हैं। इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। ३. सुषुप्ति-अवस्था३—इस अवस्था में प्रमाता के अंतस् में तमोगुण की इतनी मात्रा बढ़ जाती है कि वह सारे तन-मन की सुध खोकर गहरे मोह में पड़ जाता है। इन्द्रियों की शक्ति न ४ज्ञानरूप में और न ज्ञेयरूप में ही कुछ काम कर सकती है। फलतः प्रमाता केवल आन्तरिक चेतना, जिसको मायापदवी पर 'चित्त' कहते हैं, के द्वारा ही विषयों का अनुभव कर सकता है। सुषुप्ति काल में विषयों की अनुभूति रहती तो अवश्य है परन्तु तमोगुण की मात्रा अधिक होने के कारण प्रमाता को इस अवस्था से उठने के अनन्तर इसमें प्राप्त की हुई अनु- भूतियाें का स्मरण स्पष्ट रूप में नहीं होता है। हां केवल उठने के अनन्तर उसको इस काल में अनुभूत विषयों के द्वारा लगे हुए संस्कारों से—'मैं सुख से सोया हुआ था; मुझे कुछ भी ज्ञात १. बौद्धं गावं च सांकल्पं शाब्दं स्पाशं च रूपजम् । रसजं गन्धजं, चान्यदैन्द्रियज्ञानमेव यत् ।। अत्र गृहीतग्रहणग्राह्यरूपता चिदात्मनः। स्फुरत्येव ज्ञानशक्तिर्जाग्रद्वृत्तिरिहैव सा ।। ( शि० सू० वा०, ८ सूत्र ) २. स्वप्नो विकल्पाः ( शि० सू०, १.९ ) । दृष्टिस्वभावस्य विभोरन्तर्नवनवोदयः । विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तद्वाह्यार्थनिरासतः ।। ( शि० सू० बा०, ९ सूत्र ) ३. अविवेको मायासाैषुप्तम् (शि० सू०, १.१०) । ४. ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादासावेवाविमर्शतः ।। सैव माया वृत्तिजालपोषकत्वात् प्रकीर्तिता । अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ।। ( शि० सू०, १० सूत्र )