भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

अवस्था भेदों में स्वरूप की एकता ३३ नहीं है' इसप्रकार का धुंधला जैसा स्मरण होता है । फलतः गहरी नींद में पड़कर केवल चित्त के द्वारा ही विषयों को अनुभव करने की अवस्था को 'सुषुप्ति-अवस्था' कहते हैं। इसमें तमो- गुण की प्रधानता होती है । इन तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त स्मृति, मद, मूर्च्छा इत्यादि अनन्त मानसिक अवस्थायें होती हैं। इनके स्वरूपविश्लेषण के विषय में शास्त्रकारों ने एक सिद्धान्त स्थापित किया है कि जिन वृत्तियों में सात्त्विक अंश की अधिकता हो उनको जाग्रत् में, जिनमें राजसिक अंश की अधिकता हो उनको स्वप्न में और जिनमें तमोगुण की प्रधानता हो उनको सुषुप्ति में अंतर्भूत समझना चाहिये । इन्हीं तीन मौलिक अवस्थाओं के पारस्परिक संयोजन और वियोजन की विचित्रता से अनन्त प्रकार की मानसिक अवस्थायें जन्म लेती हैं। उदाहरण के तौर पर इन अवस्थाओं में से प्रत्येक में त्रिरूपता पाई जाती है। जैसे— १. जाग्रत् में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न और जाग्रत् में सुषुप्ति; २. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न और स्वप्न में सुषुप्ति; ३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न तथा सुषुप्ति में सुषुप्ति । इन अवस्थाओं के गोरखधन्धे के विश्लेषण की यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं है । जिज्ञासु पाठक इनको तंत्रालोक आदि ग्रंथ पढ़कर स्वयं समझ सकते हैं। यहाँ पर केवल इस बात का परीक्षण करना अभिप्रेत है कि क्या इन अवस्थाओं की भिन्नता से स्वरूप में कोई भेद उत्पन्न हो सकता है ? शास्त्रकारों का कथन है कि इन पाँचों ही अवस्थाओं में १वेदक अर्थात् अनुभव करने वाला प्रमाता एक ही होता है । २यदि इनमें से प्रत्येक का वेदक अलग अलग होता तो एक अवस्था का अनुभव करने वाला प्रमाता दूसरी अवस्था से बिल्कुल अनभिज्ञ रहता । फल यह होता कि एक ही अवस्थाता या अनुभवी के अभाव में ये अवस्थायें ही नहीं बन सकतीं और न इनकी कोई निश्चित संख्या ही कही जा सकती । अवस्था शब्द से एक ही वस्तु की भिन्न भिन्न देश, काल, आकार आदि के साथ सम्बन्धित दशा अथवा स्थिति का अभिप्राय लिया जाता है । स्पष्ट है कि अवस्थाओं की संख्या चाहे जितनी भी हो उन सबों का सम्बन्ध ३एक ही अवस्थाता के साथ होना आवश्यक है। अतः ये पाँचों अवस्थायें एक ही चेतन प्रमाता की स्वयं अङ्गीकृत अवस्थायें हैं और, स्थूलरूप में इनमें पारस्परिक स्वरूप भेद होते हुए भी इनका अनुभव करने वाली चेतन सत्ता की उपलब्द्धता (अनुभव करने का स्वभाव) में, कोई अन्तर नहीं पड़ता है । १. इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति (तं०, १०.२२९) । २. एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्यवस्थानामव- स्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् (तं० वि०, १०.२२८) । ३. एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः । (तं० वि०, १०.२२८) ३

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 43, कुल 190 में से · BharatKosha