भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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३४ स्पन्दकारिका इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों के प्रमाणों अथवा सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि आये दिन कम से कम प्रत्येक मनुष्य इस बात का स्वयं ही अनुभव कर लेता है । एक ही मनुष्य किसी दिन नींद से उठते ही ऐसा कह डालता है कि—'अरे मैं कल जाग्रत्-अवस्था में पत्र लिख रहा था; रात को किसी समय स्वप्न-अवस्था में हवाई जहाज में उड़ रहा था और तदनन्तर इतनी गहरी नींद में डूब गया कि मुझे किसी बात की सुध-बुध न रही' । यदि इन तीनों अवस्थाओं में उसके चैतन्यात्मक स्वभाव में कोई भेद होता तो वह प्रातः उठकर तीनों अनुभूतियों को समानरूप से कैसे अभिव्यक्त कर सकता ? इसी से यह बात भी समझ में आ जाती है कि चेतन प्रमाता ही इन अवस्थाओं की अभि- व्यक्ति और इनका अनुभव भी कर सकता है । अतः ये एक ही चैतन्यसत्ता के भिन्न भिन्न अवस्थामात्र हैं ॥३॥ [सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता] पूर्वसूत्र में यह कहा गया कि जाग्रत् इत्यादि अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता व्याप्त रहता है । परन्तु संसार में 'मैं सुखी हूँ'; 'मैं भूखा हूँ;' 'मैं कृश हूँ'; 'मैं कुछ भी नहीं हूँ'; इत्यादि बहुत सी ऐसी विकल्पात्मक अनुभूतियाँ हैं जो कि प्रत्यक्षरूप में शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्य इन पर अवसित होने वाली 'अहं प्रतीति' के द्वारा अनुमेय और सुख, दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट अनेक प्रकार के जीवात्माओं के साथ सम्बन्धित होती हैं । ऐसी दशा में प्रत्येक अनुभूति के साथ सम्बन्धित एक ही अनुभवी की वर्तमानता कैसे स्वीकार की जा सकती है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान किया जा रहा है— अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥४॥ स चानुस्यूत एव सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी, रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन; अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः ..............................'स स्वभावः परः स्मृतः ।' इति ॥४॥ अनुवाद सूत्र—यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं अनुरक्त हूँ' ये और इसी प्रकार के दूसरे विकल्पज्ञान (शरीर इत्यादि से भिन्न) किसी दूसरी ही वेदकसत्ता के साथ सम्बन्धित होते हैं । वह (वेदकसत्ता) स्वतः इन सबों से नितरां भिन्न होने पर भी, इन सबों में अनुस्यूत होती है ॥४॥ वृत्ति—वह स्पन्दात्मक स्वभाव सारी अवस्थाओं में अनुस्यूत अर्थात् धागे की तरह पिरोया हुआ ही है क्योंकि—'जो ही मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ' इस प्रकार की अनुभूतियों में साधारण 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही वेदक की अनुस्यूतता पाई जाती है । 'अन्यत्र' शब्द उस स्वभाव का द्योतक है जो स्वयं सारी अवस्थाओं से भिन्न है । आगमशास्त्रों में इस प्रकार कहा गया है । 'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एव उत्कृष्ट कहा गया है' ॥ ४ ॥