भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 190 में से

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सुखित्ता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३५ विवरण प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने, बौद्धों के क्षणिकविज्ञानवाद, मीमांसकों के सुख दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट आत्मवाद और चार्वाकों के देहात्मवाद का, सूत्रात्मक रूप में खण्डन करके अपने स्पन्द-सिद्धान्त का मण्डन किया है। ग्रन्थकार के अभिप्राय को सरलता- पूर्वक और अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इन सारे दार्शनिकों के दृष्टिकोणों का संक्षेप में उल्लेख करना आवश्यक है। १. बौद्ध-दार्शनिकों का क्षणिकविज्ञानवाद—इस संसार में 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस- प्रकार व्यवहार में लाये जाने वाले परामर्शों के रूप में, भिन्न भिन्न आकार-प्रकार वाले ज्ञान- क्षण ही प्रकाशमान हैं। १इनके अतिरिक्त और किसी आधारभूत स्पन्दात्मक चैतन्य (स्वभाव- भूत विश्वात्मा) की सत्ता को स्वीकारना ठीक नहीं है क्योंकि वैसा करने में कल्पनागौरव के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होगा। वे ज्ञानक्षण परस्पर विलक्षण होते हुए भी स्वयं ही प्रकाशवान् हैं। उनको किसी दूसरे पदार्थ के द्वारा प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ज्ञान एक ही प्रकार का नहीं है अपितु प्रमाता (प्रमाता जो कि स्वयं भी इन ज्ञान- क्षणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है) के हृदय में, अजस्ररूप में, भिन्न २भिन्न समय, भिन्न भिन्न विषय और भिन्न आकार-प्रकारों के साथ सम्बन्धित ज्ञानक्षणों की एक धारा बहती रहती है जिसको 'ज्ञान-सन्तान' कहते हैं। ज्ञानक्षणों की भिन्नता इसलिए कही जाती है कि एक ज्ञान केवल तीन ३क्षणों तक ठहर सकता है अतः प्रति तीन क्षणों के पश्चात् उसका समय, विषय और आकार-प्रकार बदल जाता है। अब जो प्रत्यक्षतः इनमें एकरूपता जैसी अनुभव में आती है वह केवल इसलिए कि पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तर उत्तर काल के ज्ञानक्षणों को जन्म देते हैं। संस्कार का स्वभाव ही स्थितिस्यापकता अर्थात् पहली ही जैसी दशा को जन्म देना होता है। इसी स्वभाव के कारण पहले पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार, दूसरे, परन्तु पहले जैसे ही, आकार-प्रकार वाले अपर ज्ञानक्षणों को उत्पन्न करते हैं जिससे कि इनमें एकरूपता पाई जाती है। ये ज्ञानक्षण दो प्रकार के हैं "निर्विकल्प और सविकल्प"। निर्विकल्प ज्ञानक्षणों का शास्त्रीय नाम ४'स्वलक्षणाभास' है अर्थात् किसी वस्तु का पहली बार प्रत्यक्ष हो जाने पर उस वस्तु के साथ सम्बन्धित वह प्राथमिक ज्ञानक्षण, जिसमें उस वस्तु का, किसी भी नामरूपात्मक विकल्प से रहित और मात्र उस वस्तु के विकल्पहीन स्वरूप में परिनिष्ठित, रूप में अनुभव हो १. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२४. २. ...... 'ज्ञानान्येव प्रकाशन्ते भिन्नकालानि भिन्नविषयाणि भिन्नाकाराणि च । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४) ३. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२५. ४. तत्र नीलप्रकाशः 'स्वलक्षणाभास ज्ञानम्' । 'स्वम्' अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि 'लक्षणं' देशकालाकाररूपं यस्य तस्य 'आभासः' प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन् । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४)