स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ स्पन्द कारिका जाता है। यह प्राथमिक १ज्ञानक्षण उस वस्तु या अवस्था के विकल्पहीन स्वरूप में ही संकुचित होने के कारण एक ही प्रकार का है अतः इसके द्वारा सांसारिक आदान-प्रदान सम्भव नहीं हो सकता। यह निर्विकल्प ज्ञानक्षण अपने संस्कार के द्वारा दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षण को जन्म देता है। इस क्षण तक पहुँचते पहुँचते उसी पूर्वानुभूत वस्तु या अवस्था के साथ नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्ध हो जाता है। ये २नामरूपात्मक विकल्प अनन्त प्रकार के हैं। अतः इनसे सम्बन्धित सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त प्रकार के हैं और इनके साथ अभिलाप अर्थात् शब्दों में अभिव्यक्ति का भी सम्बन्ध हो जाता है। ३स्थान को घेरने वाली और वजन से युक्त वस्तु का नाम 'रूप' है। वज़न से रहित और स्थान न घेरने वाली वस्तु को 'नाम' कहते हैं। इस लक्षण के अनुसार पहले में पृथिवी, जल, तेज और वायु ये चार महाभूत और इनसे उत्पन्न शरीर और दूसरे में विकल्पात्मक मानसिक प्रवृत्तियाँ अन्तर्भूत हो जाती हैं। नाम के चार भेद हैं—'वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान'। रूप एक ही प्रकार का है। फलतः रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पांच स्कन्धों का समुदाय ही सन्तान- रूप में बहने वाली ज्ञानधारा है। इनमें से 'विज्ञान' से निर्विकल्प और 'संज्ञा' से सविकल्प ज्ञान- क्षणों का अभिप्राय है। पहले भी कहा गया है कि बौद्धों के मतानुसार यही ज्ञानसन्तान चेतन आत्मा का सारा स्मरण, उपलब्धि इत्यादि कार्य सिद्ध कर लेता है। ४अतः उससे भिन्न किसी दूसरे नित्य एवं उपलब्ध आत्मा की कल्पना करके इन त्रिक्षणवृत्ति ज्ञानों का उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना यथार्थ से बहुत दूर है। वास्तव में इन ज्ञानक्षणों के बीच में ऐसी किसी दूसरी चेतन सत्ता की वर्तमानता अनुभव में भी नहीं आती है। अब जो 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परा- मर्शों में 'मैं' की प्रतीति देखने में आती है उसका पर्यवसान केवल या तो 'रूप' अर्थात् शरीर- सन्तान अथवा 'नाम' अर्थात् ज्ञानसन्तान पर ही हो जाता है। इनसे इतर किसी कपोलकल्पित 'आत्मा' नामक चेतन पदार्थ पर नहीं। २. मीमांसकों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद—मीमांसकों से यहाँ पर भाट्टमत के अनु- यायी कुमारिल जैसे उद्भट मीमांसागुरुओं का अभिप्राय है। ५उन्होंने अपने समय में अनात्म- वादी बौद्धों के प्रखर तर्कों को अपने पाण्डित्यपूर्ण एवं अकाट्य तर्कों से विशीर्ण करके धराशायी कर दिया और भारत में पुनः वैदिक धर्म की मर्यादा का त्राण किया। इन लोगों का मत बहुत मात्रा तक न्याय के प्रत्यक्ष, अनुमान इत्यादि प्रमाणों पर आधारित है। १. स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) २. साभिलापं विकल्पाख्यं बहुधा....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) ३. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ, १२४. ४. ....नापि तद्द्वयम् । नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्यात्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥ ( ई० प्र०, १.२.२ ) ५. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३१२.