स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
अवस्था भेदों में स्वरूप की एकता ३३ नहीं है' इसप्रकार का धुंधला जैसा स्मरण होता है । फलतः गहरी नींद में पड़कर केवल चित्त के द्वारा ही विषयों को अनुभव करने की अवस्था को 'सुषुप्ति-अवस्था' कहते हैं। इसमें तमो- गुण की प्रधानता होती है । इन तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त स्मृति, मद, मूर्च्छा इत्यादि अनन्त मानसिक अवस्थायें होती हैं। इनके स्वरूपविश्लेषण के विषय में शास्त्रकारों ने एक सिद्धान्त स्थापित किया है कि जिन वृत्तियों में सात्त्विक अंश की अधिकता हो उनको जाग्रत् में, जिनमें राजसिक अंश की अधिकता हो उनको स्वप्न में और जिनमें तमोगुण की प्रधानता हो उनको सुषुप्ति में अंतर्भूत समझना चाहिये । इन्हीं तीन मौलिक अवस्थाओं के पारस्परिक संयोजन और वियोजन की विचित्रता से अनन्त प्रकार की मानसिक अवस्थायें जन्म लेती हैं। उदाहरण के तौर पर इन अवस्थाओं में से प्रत्येक में त्रिरूपता पाई जाती है। जैसे— १. जाग्रत् में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न और जाग्रत् में सुषुप्ति; २. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न और स्वप्न में सुषुप्ति; ३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न तथा सुषुप्ति में सुषुप्ति । इन अवस्थाओं के गोरखधन्धे के विश्लेषण की यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं है । जिज्ञासु पाठक इनको तंत्रालोक आदि ग्रंथ पढ़कर स्वयं समझ सकते हैं। यहाँ पर केवल इस बात का परीक्षण करना अभिप्रेत है कि क्या इन अवस्थाओं की भिन्नता से स्वरूप में कोई भेद उत्पन्न हो सकता है ? शास्त्रकारों का कथन है कि इन पाँचों ही अवस्थाओं में १वेदक अर्थात् अनुभव करने वाला प्रमाता एक ही होता है । २यदि इनमें से प्रत्येक का वेदक अलग अलग होता तो एक अवस्था का अनुभव करने वाला प्रमाता दूसरी अवस्था से बिल्कुल अनभिज्ञ रहता । फल यह होता कि एक ही अवस्थाता या अनुभवी के अभाव में ये अवस्थायें ही नहीं बन सकतीं और न इनकी कोई निश्चित संख्या ही कही जा सकती । अवस्था शब्द से एक ही वस्तु की भिन्न भिन्न देश, काल, आकार आदि के साथ सम्बन्धित दशा अथवा स्थिति का अभिप्राय लिया जाता है । स्पष्ट है कि अवस्थाओं की संख्या चाहे जितनी भी हो उन सबों का सम्बन्ध ३एक ही अवस्थाता के साथ होना आवश्यक है। अतः ये पाँचों अवस्थायें एक ही चेतन प्रमाता की स्वयं अङ्गीकृत अवस्थायें हैं और, स्थूलरूप में इनमें पारस्परिक स्वरूप भेद होते हुए भी इनका अनुभव करने वाली चेतन सत्ता की उपलब्द्धता (अनुभव करने का स्वभाव) में, कोई अन्तर नहीं पड़ता है । १. इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति (तं०, १०.२२९) । २. एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्यवस्थानामव- स्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् (तं० वि०, १०.२२८) । ३. एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः । (तं० वि०, १०.२२८) ३
३४ स्पन्दकारिका इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों के प्रमाणों अथवा सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि आये दिन कम से कम प्रत्येक मनुष्य इस बात का स्वयं ही अनुभव कर लेता है । एक ही मनुष्य किसी दिन नींद से उठते ही ऐसा कह डालता है कि—'अरे मैं कल जाग्रत्-अवस्था में पत्र लिख रहा था; रात को किसी समय स्वप्न-अवस्था में हवाई जहाज में उड़ रहा था और तदनन्तर इतनी गहरी नींद में डूब गया कि मुझे किसी बात की सुध-बुध न रही' । यदि इन तीनों अवस्थाओं में उसके चैतन्यात्मक स्वभाव में कोई भेद होता तो वह प्रातः उठकर तीनों अनुभूतियों को समानरूप से कैसे अभिव्यक्त कर सकता ? इसी से यह बात भी समझ में आ जाती है कि चेतन प्रमाता ही इन अवस्थाओं की अभि- व्यक्ति और इनका अनुभव भी कर सकता है । अतः ये एक ही चैतन्यसत्ता के भिन्न भिन्न अवस्थामात्र हैं ॥३॥ [सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता] पूर्वसूत्र में यह कहा गया कि जाग्रत् इत्यादि अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता व्याप्त रहता है । परन्तु संसार में 'मैं सुखी हूँ'; 'मैं भूखा हूँ;' 'मैं कृश हूँ'; 'मैं कुछ भी नहीं हूँ'; इत्यादि बहुत सी ऐसी विकल्पात्मक अनुभूतियाँ हैं जो कि प्रत्यक्षरूप में शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्य इन पर अवसित होने वाली 'अहं प्रतीति' के द्वारा अनुमेय और सुख, दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट अनेक प्रकार के जीवात्माओं के साथ सम्बन्धित होती हैं । ऐसी दशा में प्रत्येक अनुभूति के साथ सम्बन्धित एक ही अनुभवी की वर्तमानता कैसे स्वीकार की जा सकती है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान किया जा रहा है— अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥४॥ स चानुस्यूत एव सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी, रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन; अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः ..............................'स स्वभावः परः स्मृतः ।' इति ॥४॥ अनुवाद सूत्र—यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं अनुरक्त हूँ' ये और इसी प्रकार के दूसरे विकल्पज्ञान (शरीर इत्यादि से भिन्न) किसी दूसरी ही वेदकसत्ता के साथ सम्बन्धित होते हैं । वह (वेदकसत्ता) स्वतः इन सबों से नितरां भिन्न होने पर भी, इन सबों में अनुस्यूत होती है ॥४॥ वृत्ति—वह स्पन्दात्मक स्वभाव सारी अवस्थाओं में अनुस्यूत अर्थात् धागे की तरह पिरोया हुआ ही है क्योंकि—'जो ही मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ' इस प्रकार की अनुभूतियों में साधारण 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही वेदक की अनुस्यूतता पाई जाती है । 'अन्यत्र' शब्द उस स्वभाव का द्योतक है जो स्वयं सारी अवस्थाओं से भिन्न है । आगमशास्त्रों में इस प्रकार कहा गया है । 'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एव उत्कृष्ट कहा गया है' ॥ ४ ॥
सुखित्ता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३५ विवरण प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने, बौद्धों के क्षणिकविज्ञानवाद, मीमांसकों के सुख दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट आत्मवाद और चार्वाकों के देहात्मवाद का, सूत्रात्मक रूप में खण्डन करके अपने स्पन्द-सिद्धान्त का मण्डन किया है। ग्रन्थकार के अभिप्राय को सरलता- पूर्वक और अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इन सारे दार्शनिकों के दृष्टिकोणों का संक्षेप में उल्लेख करना आवश्यक है। १. बौद्ध-दार्शनिकों का क्षणिकविज्ञानवाद—इस संसार में 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस- प्रकार व्यवहार में लाये जाने वाले परामर्शों के रूप में, भिन्न भिन्न आकार-प्रकार वाले ज्ञान- क्षण ही प्रकाशमान हैं। १इनके अतिरिक्त और किसी आधारभूत स्पन्दात्मक चैतन्य (स्वभाव- भूत विश्वात्मा) की सत्ता को स्वीकारना ठीक नहीं है क्योंकि वैसा करने में कल्पनागौरव के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होगा। वे ज्ञानक्षण परस्पर विलक्षण होते हुए भी स्वयं ही प्रकाशवान् हैं। उनको किसी दूसरे पदार्थ के द्वारा प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ज्ञान एक ही प्रकार का नहीं है अपितु प्रमाता (प्रमाता जो कि स्वयं भी इन ज्ञान- क्षणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है) के हृदय में, अजस्ररूप में, भिन्न २भिन्न समय, भिन्न भिन्न विषय और भिन्न आकार-प्रकारों के साथ सम्बन्धित ज्ञानक्षणों की एक धारा बहती रहती है जिसको 'ज्ञान-सन्तान' कहते हैं। ज्ञानक्षणों की भिन्नता इसलिए कही जाती है कि एक ज्ञान केवल तीन ३क्षणों तक ठहर सकता है अतः प्रति तीन क्षणों के पश्चात् उसका समय, विषय और आकार-प्रकार बदल जाता है। अब जो प्रत्यक्षतः इनमें एकरूपता जैसी अनुभव में आती है वह केवल इसलिए कि पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तर उत्तर काल के ज्ञानक्षणों को जन्म देते हैं। संस्कार का स्वभाव ही स्थितिस्यापकता अर्थात् पहली ही जैसी दशा को जन्म देना होता है। इसी स्वभाव के कारण पहले पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार, दूसरे, परन्तु पहले जैसे ही, आकार-प्रकार वाले अपर ज्ञानक्षणों को उत्पन्न करते हैं जिससे कि इनमें एकरूपता पाई जाती है। ये ज्ञानक्षण दो प्रकार के हैं "निर्विकल्प और सविकल्प"। निर्विकल्प ज्ञानक्षणों का शास्त्रीय नाम ४'स्वलक्षणाभास' है अर्थात् किसी वस्तु का पहली बार प्रत्यक्ष हो जाने पर उस वस्तु के साथ सम्बन्धित वह प्राथमिक ज्ञानक्षण, जिसमें उस वस्तु का, किसी भी नामरूपात्मक विकल्प से रहित और मात्र उस वस्तु के विकल्पहीन स्वरूप में परिनिष्ठित, रूप में अनुभव हो १. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२४. २. ...... 'ज्ञानान्येव प्रकाशन्ते भिन्नकालानि भिन्नविषयाणि भिन्नाकाराणि च । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४) ३. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२५. ४. तत्र नीलप्रकाशः 'स्वलक्षणाभास ज्ञानम्' । 'स्वम्' अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि 'लक्षणं' देशकालाकाररूपं यस्य तस्य 'आभासः' प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन् । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४)
३६ स्पन्द कारिका जाता है। यह प्राथमिक १ज्ञानक्षण उस वस्तु या अवस्था के विकल्पहीन स्वरूप में ही संकुचित होने के कारण एक ही प्रकार का है अतः इसके द्वारा सांसारिक आदान-प्रदान सम्भव नहीं हो सकता। यह निर्विकल्प ज्ञानक्षण अपने संस्कार के द्वारा दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षण को जन्म देता है। इस क्षण तक पहुँचते पहुँचते उसी पूर्वानुभूत वस्तु या अवस्था के साथ नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्ध हो जाता है। ये २नामरूपात्मक विकल्प अनन्त प्रकार के हैं। अतः इनसे सम्बन्धित सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त प्रकार के हैं और इनके साथ अभिलाप अर्थात् शब्दों में अभिव्यक्ति का भी सम्बन्ध हो जाता है। ३स्थान को घेरने वाली और वजन से युक्त वस्तु का नाम 'रूप' है। वज़न से रहित और स्थान न घेरने वाली वस्तु को 'नाम' कहते हैं। इस लक्षण के अनुसार पहले में पृथिवी, जल, तेज और वायु ये चार महाभूत और इनसे उत्पन्न शरीर और दूसरे में विकल्पात्मक मानसिक प्रवृत्तियाँ अन्तर्भूत हो जाती हैं। नाम के चार भेद हैं—'वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान'। रूप एक ही प्रकार का है। फलतः रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पांच स्कन्धों का समुदाय ही सन्तान- रूप में बहने वाली ज्ञानधारा है। इनमें से 'विज्ञान' से निर्विकल्प और 'संज्ञा' से सविकल्प ज्ञान- क्षणों का अभिप्राय है। पहले भी कहा गया है कि बौद्धों के मतानुसार यही ज्ञानसन्तान चेतन आत्मा का सारा स्मरण, उपलब्धि इत्यादि कार्य सिद्ध कर लेता है। ४अतः उससे भिन्न किसी दूसरे नित्य एवं उपलब्ध आत्मा की कल्पना करके इन त्रिक्षणवृत्ति ज्ञानों का उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना यथार्थ से बहुत दूर है। वास्तव में इन ज्ञानक्षणों के बीच में ऐसी किसी दूसरी चेतन सत्ता की वर्तमानता अनुभव में भी नहीं आती है। अब जो 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परा- मर्शों में 'मैं' की प्रतीति देखने में आती है उसका पर्यवसान केवल या तो 'रूप' अर्थात् शरीर- सन्तान अथवा 'नाम' अर्थात् ज्ञानसन्तान पर ही हो जाता है। इनसे इतर किसी कपोलकल्पित 'आत्मा' नामक चेतन पदार्थ पर नहीं। २. मीमांसकों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद—मीमांसकों से यहाँ पर भाट्टमत के अनु- यायी कुमारिल जैसे उद्भट मीमांसागुरुओं का अभिप्राय है। ५उन्होंने अपने समय में अनात्म- वादी बौद्धों के प्रखर तर्कों को अपने पाण्डित्यपूर्ण एवं अकाट्य तर्कों से विशीर्ण करके धराशायी कर दिया और भारत में पुनः वैदिक धर्म की मर्यादा का त्राण किया। इन लोगों का मत बहुत मात्रा तक न्याय के प्रत्यक्ष, अनुमान इत्यादि प्रमाणों पर आधारित है। १. स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) २. साभिलापं विकल्पाख्यं बहुधा....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) ३. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ, १२४. ४. ....नापि तद्द्वयम् । नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्यात्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥ ( ई० प्र०, १.२.२ ) ५. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३१२.
सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३७ उनके मतानुसार किसी भी १प्रकार के ज्ञान के साथ कोई न कोई विशेषता अवश्यमेव उपाधि बन कर रहती है। यदि रजत का ज्ञान है तो उसमें रजतत्व साथ रहता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि किसी विशेषता अथवा उपाधि के द्वारा ही किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। प्रस्तुत प्रकरण में भी इसी नियम के अनुसार 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में सुखिता अथवा दुःखिता रूप विशेषताओं या उपाधियों के द्वारा ऐसे किसी आत्मा नामक वस्तु की, अनुमान के द्वारा, प्रतीति हो जाती है, जो इन उपाधियों से विशिष्ट है। 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में दो प्रकार की प्रतीतियाँ अनुभव में आती हैं— एक, सुखिता इत्यादि रूप विशेषता या उपाधि की और दूसरी 'मैं' की। २सुखिता इत्यादि की प्रतीतियाँ गुण हैं। गुण गुणी के विना स्वतंत्र रूप में ठहर नहीं सकता है। उसको किसी आधारभूत गुणी की आवश्यकता रहती है। फलतः सुखिता इत्यादि का गुणी वही हो सकता है जिसकी प्रतीति 'मैं' से हो जाती हैं। वही आत्मा है। इसके साथ ही यह भी स्मरणीय है कि ३सुखिता, दुःखिता इत्यादि उपाधियों का किसी उपाधि-विशिष्ट आधार के बिना, घट, पट, की तरह अलग दर्शन नहीं होता है अतः 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि के द्वारा 'सुखिता' इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट 'मैं' अर्थात् आत्मभूत वस्तु की प्रतीति अनुमान के द्वारा हो जाती है। फलतः आत्मा के विषय में इनका निर्णय यह है कि 'आत्मा' के सद्भाव का अनुमान 'मैं' प्रतीति के साथ समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'सुखिता', 'दुःखिता' इत्यादि विशेषताओं के द्वारा लगाया जा सकता है। इस आत्मा के दो अंश हैं—चिद् और अचिद् । ४चिद् अंश से वह ज्ञान का अनुभव करने वाला और अचिद् अंश से सुखिता इत्यादि उपाधियों की विशि- ष्टता को प्राप्त करने वाला है। भाव यह कि आत्मा स्वयं ही सुखदुःखादिरूप नहीं अपितु तद्विशिष्ट है। अर्थात् सुख, दुःख इत्यादि विशेषताओं के द्वारा परिणाम को प्राप्त करता है। ५कुमारिलभट्ट इतना भी मानते हैं कि आत्मा स्वयं चेतन वस्तु नहीं अपितु शरीर और विषय के साथ संयोग होने की अवस्था में वह 'चैतन्य-विशिष्ट' बन जाती है। यही कारण है कि स्वप्नावस्था में विषयों के साथ सम्बन्ध छूट जाने के कारण आत्मा में तत्काल पर्यन्त चैतन्य नहीं रहता है। फलतः आत्मा जड़ भी है और बोधात्मक भी है। १. भारतीय दर्शन, पृष्ठ ३२४. २. सुखादि चेत्यमानं हि स्वतन्त्रं नानुभूयते । मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ।। (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५८, टि० २१) ३. इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ।। (तत्रैव) ४. चिदंशत्वेन दृष्टृत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा, विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञानसुखादिरूपेण परिणामित्वम् । (कश्मीरिक सदानन्द-अद्वैतब्रह्मसिद्धिः) स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः । (भा० द०, पृ० ६०२) ५. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३२८.
३८ स्पन्दकारिका इस सारे कथन का निष्कर्ष इस प्रकार है—'मैं' प्रतीति से अनुमेय और सुख-दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही आत्मा है। इससे इतर कोई नित्य और स्वप्रकाश आत्मा नहीं है। ३. चार्वाकों का देहात्मवाद—अनात्मवादी दार्शनिकों में चार्वाकों का स्थान प्राचीन भी है और महत्त्वपूर्ण भी। प्राचीन भारत में इनको लोकायतिक भी कहते थे। इनका मन्तव्य है कि शरीर से इतर आत्मा नामक किसी वस्तु का अस्तित्व मानना सच्चाई की आँखों में धूल झोंकने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि अनुभवों में सुखिता और दुःखिता इत्यादि का सम्बन्ध चेतन शरीर के साथ ही है क्योंकि प्रत्यक्ष रूप में यही देखने में आता है। जो प्रत्यक्ष हो वही सत्य है। जो प्रत्यक्ष नहीं उसके विषय में अनुमान आदि के बटेर उड़ाना मूर्खों का काम है। १चार्वाक लोग शरीर को ही चेतन आत्मा मानने के पक्ष में तीन प्रमाण प्रस्तुत करते हैं— १. जब तक शरीर रहता है (जीर्ण नहीं हो जाता है) तब तक ही चैतन्य भी रहता है। चैतन्य शरीर के साथ ही आता है और उसी के साथ जाता भी है। अन्नपान से चेतना (शरीररूप) वृद्धि पाती है और उसके अभाव में उसका ह्रास हो जाता है। अतः शरीर ही चेतन है। २. 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं भूखा हूँ' इत्यादि अनुभवों के ज्ञान, शरीर की ओर ही संकेत करते हैं क्योंकि सुखी, क्षीण इत्यादि शरीर ही हो जाता है और कोई नहीं। ३. चैतन्य और भौतिक पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध शाश्वत और यथार्थ है क्योंकि जो कुछ जिस रूप में देखने में आता है वही सत्य है। अब प्रश्न केवल इतना ही है कि इन भौतिक पदार्थों में चेतना२ का उदय कहाँ से होता है ? इस विषय में चार्वाकों का कथन है कि प्रत्यक्षरूप में जड़ दिखाई देने वाले पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार महाभूतों के आकस्मिक और किसी निश्चित नियम के अनु- सार सम्मिश्रण से स्वयं ही चैतन्य की उत्पत्ति हो जाती है और उस सम्मिश्रण का लोप हो जाने पर इसका भी लोप देखने में आता है। भूतों के सम्मिश्रण से ही शरीर की भी उत्पत्ति हो जाती है अतः स्वयं ही चैतन्ययुक्त शरीर उत्पन्न हो जाता है और मरने पर उस शरीर के चैतन्य का भी उसी के साथ नाश हो जाता है।३ सृष्टि और संहार, जगत् का अपना ही स्वभाव है। इसमें ईश्वर का कोई हाथ नहीं है। वास्तव में ईश्वर नामक पदार्थ है ही नहीं। अतः जो कुछ है वह शरीर ही है। इसी की आयु बढ़ाने का और इसी को सुखमय बनाने का उपक्रम करना ही जीवन का महत्त्वपूर्ण कार्य है। खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ। धर्म कुछ भी नहीं है। धन और काम ही जीवन के परम लक्ष्य हैं। मुक्ति की कल्पना झूठी है। मरना ही मुक्ति है।
१. तत्रैव, ८१ पृष्ठ . २. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृ० ८१. ३. तत्रैव, पृष्ठ ८२.
सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३९ इतना कहने से इनके मत का निष्कर्ष यही निकलता है कि सुखिता दुःखिता इत्यादि अनुभूतियों का और 'मैं' इस प्रतीति का सीधा सम्बन्ध शरीर के साथ है। अतः शरीर से इतर आत्मा या किसी चेतन सत्ता की विद्यमानता स्वीकार नहीं की जा सकती है। इन तीनों वादियों का मुखमुद्रण करने के लिए ग्रन्थकर्ता ने इस सूत्र के एक ही प्रहार से इनके सभी तर्कों को धराशायी कर दिया है। ग्रन्थकार के विचारानुसार 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में, एक ही आधारभूत सत्ता के दो रूपों की स्फुरणा अन्तर्निहित है। सुखिता दुःखिता अथवा मूढता इत्यादि अवस्था-विशेषों से सर्वस्वतन्त्र संवित् के उस रूप का आभास मिलता है जहाँ वह संसार की क्रीडा करने के लिए स्वेच्छा से ग्राह्यभूमिका पर अव- तीर्ण होकर स्वयं सारे प्रमेय पदार्थों का रूप धारण कर लेती है। 'अहम्' शब्द से उस रूप की ओर संकेत है जहाँ वह संसारी ग्राहक-भूमिका पर अवतीर्ण होकर स्वेच्छा से अपने आप को, पांच तन्मात्रा, मनस्, बुद्धि और अहंकार के पुर्यष्टक में फंसे हुए संसारी प्रमाता (जीवात्मा) का रूप धारण कर लेती है। 'अन्यत्र' शब्द से वह विश्वोत्तीर्ण एवं अनुत्तर रूप अभिप्रेत है जहाँ वह प्रमातृभाव पर अवस्थित होकर इन सुखिता दुःखिता इत्यादि अवस्थाओं के द्वन्द्वों से विहीन पूर्ण आनन्दघनता में विलीन रहती है। फलतः संवित्-भट्टारिका ही वह धागा है जिसमें सारी प्रमेयता माला के दानों की तरह पिरोई हुई है। यही वह अन्तिम सोपान है जहाँ पहुँच कर सारी अवस्थाओं की कल्पनायें विश्रान्त और समरस हो जाती हैं। अब रहा प्रश्न यह कि संवित्-भट्टारिका शाक्त-प्रसर के अवसर पर किस प्रकार स्वयं ही संसारी ग्राहक-भूमिका अथवा ग्राह्यभूमिका पर अवतीर्ण होती है? इस प्रक्रिया का यावत्-शक्य पर्यालोचन आगे सूत्र ६ और १६ में किया जायेगा। यहाँ पर इतना ध्यान में रखना पर्याप्त है कि शरीर, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य इत्यादि सारे जड़ एवं अजड़ पदार्थों की नानारूपता में एक ही आधारभूत एवं जीवनदायिनी स्पन्दशक्ति, अनुस्यूत रहती है और उसकी पर- मार्थसत्ता को किसी भी प्रकार से नकारा नहीं जा सकता। ग्रन्थकार के आशय को भली भांति स्पष्ट करने के लिए अब उपर्युक्त आशय की पृष्ठभूमि पर पूर्वोक्त मतवादों का थोड़ा सा परीक्षण करना युक्तियुक्त होगा- १. बौद्धवाद का पर्यालोचन-बौद्धों ने जिन भिन्नकालीन ज्ञानों की प्रकाशमानता स्वीकार की है वे तो त्रिगुणात्मक प्रकृति की विकारभूत¹ बुद्धि पर ही पर्यवसित होते हैं। इस विषय में यह बात विचारणीय है, कि क्या ज्ञान के भिन्नकालीन खण्ड हो सकते हैं और क्या ज्ञान स्वयं जड़ है या चेतन ? यदि ज्ञान भिन्नकालीन और भिन्न आकार वाले मान लिए जाएं तो उनसे कोई अखण्ड प्रतीति कैसे सम्भव हो सकती है? साथ ही यदि ज्ञान जड़ है तो जड़ होने के कारण वह किसी प्रकार की प्रतीति को कैसे प्रकाशित कर सकता है? यदि ज्ञान चेतन है तो बौद्धों को जड़ से इतर कोई चेतन सत्ता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। वे ज्ञान को स्वप्रकाश मानते हैं। प्रकाशमानता अर्थात् विषय को प्रकाशित करने के साथ साथ अपने को भी प्रकाशित करना केवल चेतन-सत्ता का ही स्वभाव हो सकता है। परन्तु बौद्ध लोग स्वयं ही द्रष्टा या उपलब्धा के रूप में किसी एक ही चेतन-सत्ता को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं १. 'ज्ञानसन्तान एव तत्त्वम्' इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः। (प्र० हृ० सूत्र ८)
.४० स्पन्दकारिका हैं। फलतः उनके द्वारा स्वीकारे गये भिन्नकालीन एवं भिन्नाकार ज्ञान अनेकाकार होने के कारण वेद्य ही बन सकते हैं वेदक नहीं। अनेकाकारता ही वेद्यता होती है। वेद्यता में अर्थ- प्रकाशित का स्वभाव नहीं हो सकता। अतः अर्थप्रकाशित के अभाव में ये ज्ञानक्षण स्वतः जड़ ही हैं। ये कदापि प्रकाशमान नहीं माने जा सकते। इसके साथ ही बौद्ध लोगों का विचार है कि संसार के सारे आदान-प्रदान दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षणों से चलते हैं और पहला निर्विकल्प ज्ञानक्षण इनका आधार होता है। वास्तव में बात ऐसी है कि ज्ञान का प्रथम क्षण अनुभवकाल और दूसरा क्षण स्मृतिकाल होता है। संसार के सारे व्यवहार प्राथमिक अनुभव पर नहीं अपितु उसकी स्मृति पर आधारित होते हैं क्योंकि संसार में एक ही पदार्थ को सैकड़ों बार देखने पर हर देखने को पहला अनुभव नहीं कहा जा सकता। स्मृतिकाल में विषय ठीक उसी रूप में प्रकाशित होते हैं जिस रूप में अनुभवकाल में उनका अनुभव हुआ होता है। विचारणीय यह है कि जब अनुभवक्षण में स्मृति नहीं है और स्मृतिक्षण में अनुभव नष्ट हुआ होता है तो ऐसी परिस्थिति में स्मृतिक्षण में घट, पट आदि पदार्थों का अनुभवकालीन रूप किस प्रकार प्रकाशित हो सकता है ? विषयों के, ठीक वैसे ही रूप में प्रकाशित न होने की दशा में उनकी स्मृति कैसी और परिमाणतः संसार के व्यवहारों का चलना भी कैसा ? अब यदि बौद्धों के संस्कारसिद्धान्त को माना जाय कि अनुभव के संस्कारों से स्मृति- क्षण में ठीक अनुभवकाल के ही आकार-प्रकार वाले विषयों का प्रकाशन हो जाता है तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि संस्कार का स्वभाव पहली जैसी स्थिति की स्थापना करना होता है। अनुभवकाल के संस्कार स्मृतिकाल में भी बिल्कुल अनुभवकाल के समान रूपवाले ज्ञानों को जन्म देंगे। अनुभवकाल में विषय का अनुभव निर्विकल्प रूप में होता है। अतः स्मृतिकाल में भी ज्ञानों का रूप निर्विकल्प ही होगा। अर्थात् स्मृति का विषय बने हुए ग्राह्यपदार्थों में किसी प्रकार की नामरूपादि की कल्पना सम्भव नहीं होगी। ऐसी दशा में स्मृति के द्वारा भी संसार के आदान-प्रदान कैसे सम्भव होंगे ? इन बाधाओं को दृष्टि में रखकर शैव दार्शनिक इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि वास्तव में इन दोनों ही ज्ञानक्षणों के बीच में इनसे इतर चेतन और स्वयंप्रकाशमान सत्ता अनुस्यूत है जिसमें सारे अनुभव, स्मृतियां, आकार और प्रकार बीज में वृक्ष के समान अवस्थित हैं। वह चेतनसत्ता स्वप्रकाश होने के कारण अपने आन्तरिक अनुसन्धान के द्वारा अनुभव और स्मृति को एकाकार बनाकर और निर्विकल्प को नामरूपादि की कल्पना के द्वारा सवि- कल्प का रूप देकर, संसार के व्यवहारों को चलाती है। २. मीमांसकवाद का पर्यालोचन—१सुखदुःखादिविशिष्ट 'मैं' प्रतीति को ही आत्मा का नाम देते हुए ये लोग वास्तव में बुद्धितत्त्व पर ही अवस्थित हैं क्योंकि सुख, दुःख और मोह अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं। इस विषय में यह विचारणीय है कि यदि आत्मसत्ता प्रति- १. अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिस्तिरस्कृत आत्मा—इति मन्वाना मीमांसका अपि बुद्धावेव निविष्टाः। (प्र० हृ०, सूत्र ८)
स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४१ समय सुखदुःखादि की उपाधियों के नीचे दबी रहती है तो उसको चेतन और स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर सुखदुःखादि अवस्थाओं को, उसके प्रतिद्वन्द्वी के रूप में, एक अलग सत्तावान् पदार्थ मानना पड़ेगा परन्तु ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि सुखदुःखादि स्वयं जड़ और अनेक होने के कारण शाश्वत सत्तावान् पदार्थ नहीं माने जा सकते हैं। कुमारिल जैसे प्रख्यातनामा मीमांसक आत्मा को स्वतन्त्ररूप में चैतन्य न मान कर चैतन्य-विशिष्ट मानते हैं। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह हो सकता है कि आत्मा में चैतन्य और कहीं से आया है। कहाँ से आया है यह स्पष्ट नहीं है। कहीं से भी आया हो, परन्तु उसको स्वतन्त्र न रख कर, आत्मा की विशेषता बनाना और आत्मा को उसका विशेष्य बनाना निष्प्राण कामिनी के गले में कंचन का हार डालने के समान है। यह कहना कि 'गुण, गुणी के बिना ठहर नहीं सकता है' न्यायसंगत नहीं है। ऐसी अवस्था में भी आत्मा की स्वतन्त्रता और एकता संशय में पड़ जाती है। साथ ही यह नियम केवल संसारभूमिका पर ही चलता है क्योंकि विश्वात्मा वही बन सकता है जो गुणों को सत्ता प्रदान करने पर भी स्वयं गुणातीत हो। फलतः इन लोगों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद भी कुछ संतोषजनक नहीं है। ३. चार्वाकों के देहात्मवाद का पर्यालोचन—¹चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा प्राचीन भारत के सारे बौद्ध, जैन और ब्राह्मण मतावलम्बियों को समानरूप से कभी भी मान्य नहीं रही है। कम से कम आज भी, जबकि विश्व के कोने कोने में भौतिकवाद अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुका है, चार्वाकीय विचारधारा भारतीय वसुन्धरा पर पनप नहीं सकती है। यहाँ के जनमानस की गहराइयों में शैव और वेदान्त जैसे दर्शनों के अध्यात्मवाद ने शताब्दियों से इतनी मजबूत जड़ पकड़ ली है कि कोई या किसी प्रकार की भी भौतिकता-मूलक विचारधारा उसको सरलता से हिला नहीं सकती। चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा स्पष्टरूप में देहात्मवाद, प्रत्यक्षवाद और आधिभौतिक सुखवाद पर आधारित है। इसमें धर्म, आचार और ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। भारत का, दिनभर कड़कती धूप में काम करने वाला खेतीहर या सड़क पर पत्थर तोड़ने वाला मजदूर, दिन भर खून-पसीना एक करके सायंकाल को मंदिर में जाकर, जब तक भोलेनाथ या गिरधर की आरती न उतारे, तब तक उसको चैन कहाँ ? भले ही उसका उदर आधा खाली ही रहे परन्तु ज़ोर ज़ोर से घड़ियाल बजाने में उसको अपूर्व आनन्द और संतोष प्राप्त होता है। यह बात उसके रक्त में मिली हुई है; आखिर इससे उसको अलग कैसे, किया जा सकता है ? चार्वाकों का देहात्मवाद तो खैर, शरीर की नश्वरता प्रत्यक्षरूप में देखने से ही संशय में पड़ जाता है परन्तु केवल प्रत्यक्षवाद को स्वीकार करना भी तर्क के अनुकूल नहीं है। आखिर संसार के व्यवहार कभी कभी अनुमान या आप्तवाक्य पर भी चलते हुए दिखाई देते हैं। अतः इन दो प्रमाणों को किसी के कहने मात्र से ही झुठलाया नहीं जा सकता। इसके साथ ही इन लोगों ने भौतिकसुखवाद के अन्तर्गत जिस प्रकार के आचार-विचार की रूपरेखा प्रस्तुत कर रखी है वह तो आदर्शवादी भारतीय मस्तिष्क को कभी मान्य नहीं होगी। १. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ७१-८७.
४२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri फलतः निष्कर्ष यही निकलता है कि अध्यात्मवाद की पृष्ठभूमि पर चार्वाकों के देहात्मवाद का आलोचन करना सरासर अन्याय है क्योंकि जब ये लोग शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी आत्मा नामक सत्ता के सद्भाव को नहीं स्वीकारते हैं तो उन पर यह सिद्धान्त थोपा भी कैसे जा सकता है ? ॥४॥ [स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व] अब सूत्रकार अगले सूत्र में स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका का स्वरूप-वर्णन करने के साथ साथ, उसकी परमार्थ-सत्ता को सिद्ध कर रहे हैं :- न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ ५ ॥ तस्य चायं स्वभावो यत् सुख-दुःख-ग्राह्यग्राहक-मूढतादिभावैरस्पृष्टः। स एव च परमार्थतोऽस्ति नित्यत्वात् । सुखादयः पुनः संकल्पोत्थाः क्षणभङ्गुरा आत्मस्वरूप- बाह्याः शब्दादिविषयतुल्याः। न च, सुखादिस्वरूपो यदा नासौ तदा पाषाणप्रख्य एव ॥ ५ ॥ अनुवाद सूत्र—जिसमें दुःख, सुख की अवस्थायें नहीं हैं, जिसको ग्राह्यता¹ या ग्राहकता² छू भी नहीं लेती हैं और, जो मूढभाव³ से सर्वथा रहित है वही तत्त्व परमार्थसत्⁴ है ॥५॥ वृत्ति—उस स्पन्द-तत्त्व का यह स्वभाव है कि उसको सुख, दुःख, ग्राह्यता, ग्राहकता, और मूढता इत्यादि भाव कभी भी स्पर्श नहीं करते हैं। वही तत्त्व परमार्थ-सत् है क्योंकि वह नित्य है। सुख इत्यादि केवल मानसिक संकल्पों की ही उपज हैं, क्षणमात्र में नष्ट होने वाले हैं और आत्मा के वास्तविक रूप से बाह्य हैं। अतः वे भी शब्द इत्यादि ज्ञेय-विषयों के ही तुल्य-कक्ष हैं। इस सम्बन्ध में यह सोचना भी व्यर्थ है कि यदि उस तत्त्व को सुख इत्यादि की अनुभूति नहीं तो वह पत्थर के समान (जड़) है ॥५॥ विवरण शाश्वत-स्पन्दमयी संवित्-भट्टारिका बहिर्मुखीन विश्वरूप में प्रसृत होने की उन्मुखता में स्वयं बहिर्मुख होकर सबसे पहले सूक्ष्म प्राणभूमिका या सामान्य-प्राणना की भूमिका पर अवतीर्ण होकर, त्रिगुणात्मक अन्तःकरणों का रूप धारण कर लेती है। इन त्रिगुणात्मक अन्तःकरणों का रूप ही सुख, दुःख और मोह होता है। अतः सुखिता, दुःखिता और मूढता १. शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध के रूप में बहिरङ्ग प्रमेयता । २. पुर्यष्टक में नियन्त्रित जीव का मित प्रमातृ-भाव । ३. किसी भी वेद्य पदार्थ को ज्ञान का विषय बनाने के सामर्थ्य का अभाव; अचेतनता की जैसी अवस्था । ४. शाश्वत रूप में और सदा एक रूप में वर्तमान सत्ता ।
स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४३ इत्यादि अवस्थायें स्वरूप से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। १यह तो अखण्ड—ज्ञानरूपा पारमेश्वरी शक्ति है जो कि आन्तर और बाह्य रूप में प्रकाशमान, नील सुख इत्यादि वेद्य पदार्थों के रूप में स्वयं ही प्रकाशमान है। प्रतिसमय संसार में देखा जाता है कि प्रत्येक प्रमाता ज्ञान के द्वारा ही इन नील सुखादि विषयों का अनुभव करता है, अर्थात् ज्ञान-सत्ता के आधार के बिना किसी भी विषय की कोई सत्ता नहीं है। इससे यह बात स्पष्ट होती हैं कि जो जिसके बिना अलग रूप में स्थित नहीं रह सकता वह उससे अभिन्न हुआ करता है। २फलतः नील सुखादि भी ज्ञान से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। यदि यह अवस्थायें ज्ञानरूप हैं तो हैं, यदि नहीं हैं तो नहीं हैं। जिसप्रकार यदि मिट्टी है तो घट है यदि मिट्टी नहीं है तो घट भी नहीं है। इस सम्बन्ध में यह बात स्मरणीय है कि चित्-तत्त्व का स्वरूप विश्वात्मक अहंविमर्श है। इस अहंविमर्श के दो रूप हैं—शुद्ध तथा अशुद्ध। शुद्ध का सम्बन्ध पतिप्रमातृभाव के साथ है। इसमें सारी अवस्थायें और सारे विरोधात्मक द्वन्द्व अपनी भेदमयता को भूल कर विशुद्ध चिद्रूप एकाकारता में उसी प्रकार अवस्थित रहते हैं जिस प्रकार संसार की सारी सरितायें सागर में पहुँच कर सरितायें न रह कर सागर ही बन जाती हैं। अशुद्ध अहं- विमर्श (माया शक्ति के द्वारा संकोच में पड़ी हुई 'मैं' प्रतीति) का सम्बन्ध संसारी जीव अथवा पशु-प्रमातृभाव के साथ है। यह वह अवस्था है जिसमें वही विशुद्ध चित्-३तत्त्व, अपने ही रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा, अपनी ही अभिन्न ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और माया- शक्ति को संकोच में डाल कर क्रमशः४ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण (बुद्धि, मनस् और अहंकार) के समष्टिरूप चित्त के रूप को धारण कर लेता है। यह चित्त ही प्रत्येक प्रकार की अवस्थाओं, उपाधियों, उनके पारस्परिक विरोधात्मक द्वन्द्वों, विचित्र प्रकार के शरीरों एवं आकार-प्रकारों की अनेकाकारता की सर्जना करके उनको अपना वास्तविक स्वरूप समझता रहता है जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और है। फलतः विशुद्ध चित्-तत्त्व प्रतिसमय अखंड ज्ञानात्मक एकाकारता होने के कारण इन सारी सुखिता, दुःखिता, ग्राह्यता और ग्राहकता की उपाधियों से रहित और परमार्थसत् है। अब जो पशु प्रमातृ-भाव की पदवी पर प्रत्येक जीवधारी में इन उपाधियों के प्रति 'अहं' १. तत्तद्रूपतया ज्ञानं बहिरन्तः प्रकाशते । ज्ञानादृते नार्थसत्ता ज्ञानरूपं ततो जगत् ॥ (का० क्र० उदाहृत शि० सू० वि०, सू० ३०) २. नहि ज्ञानादृते भावाः केनचिद्विषयीकृताः । ज्ञानं तदात्मतां यातमेतस्मादवसीयते ॥ (तत्रैव) ३. चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (प्र० हृ०, ५) ४. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ (ई० प्र०, ३-२-४)
सूत्र के अन्तिम पाद में आत्मतत्त्व की परमार्थसत्ता की बात कहने से सूत्रकार ने
४४ स्पन्दकारिका अभिनिवेश देखने में आता है वह तो केवल अपने वास्तविक चैतन्य स्वरूप की अनुभूति की हीनता के कारण ही है। १इसके विपरीत निरन्तर अभ्यास एवं गुरुकृपा से आत्मस्वरूप की अनुभूति को प्राप्त करने वाले साधक, इन सारी उपाधियों को, दूसरे घट पट आदि ग्राह्य पदार्थों की तरह ही अपने से अलग 'इदम्' रूप में और अपने आत्मस्वरूप को विशुद्ध 'अहं' रूप में अनुभव कर लेते हैं। फलतः ऐसे व्यक्तियों को संसार के द्वन्द्व प्रभावित नहीं कर सकते हैं। अब रहता है मूढता का प्रश्न। इस विषय में कई दार्शनिकों का यह विचार है कि यदि आत्मस्वरूप में सुख दुःख इत्यादि अवस्थाओं का नितान्त अभाव अर्थात् इनकी संवेदन- हीनता ही है तो उसका स्वरूप भी २मूढता अर्थात् वेद्यपदार्थों की अनुभूति के सामर्थ्य का अभाव ही है। शास्त्रों में इस शंका का निवारण इस प्रकार किया गया है कि ३यदि कोई व्यक्ति संज्ञाहीनता अथवा प्रगाढ सुषुप्ति की अवस्था में पड़ा हुआ हो तो प्रत्यक्षरूप में उसे किसी बात का संवेदन नहीं होता है। परन्तु ज्योंही वह ऐसी अवस्था से उठता है तो कहने लगता है; 'अरे, मैं तो गहरी संवेदनहीनता (मूढता) में पड़ा हुआ था'। यदि उस समय में उसकी आत्मा सत्यतः ही मूढ बनी होती तो उसको मूढता में पड़े रहने का संवेदन ही कैसे होता ? मूढ़ता से सर्वशून्यावस्था का अभिप्राय है तो ऐसी अवस्था में रहने की अवधि का उसको किसी भी प्रकार का संवेदन नहीं होना चाहिये था, परन्तु वैसा देखने में नहीं आता है। अतः मूढता भी आत्मा का स्वरूप नहीं है। सूत्र के अन्तिम पाद में आत्मतत्त्व की परमार्थसत्ता की बात कहने से सूत्रकार ने 'असत् = सर्वाभाव' को ही शाश्वत यथार्थ मानने वाले लोगों का मुखमुद्रण किया है। सूत्रकार के मतानुसार सर्वोपाधिरहित विशुद्ध आत्मस्वरूप निश्चयपूर्वक परमार्थ-सत् है जबकि उससे इतर यह सारा कार्यरूप प्रपञ्च संवृति-सत् है। जो वस्तु परमार्थ सत् है वह कभी असत् नहीं हो सकती है। यदि उसको 'असत्' मान लिया जाये तो इस शङ्का का समाधान नहीं हो सकता है कि 'असत्' वस्तु से 'सत्' (सत्स्वरूप में दिखाई देने वाले कार्यरूप जगत् ) की उत्पत्ति कैसे हुई है ? फलतः मौलिक स्पन्दतत्त्व स्वयं 'सत्' है और इसी कारण उससे, दृश्यमान कार्यरूप 'सत्' का ही विकास होता है। सूत्र के तीसरे और चौथे पाद में शून्यवादी माध्यमिकों (बौद्ध दार्शनिकों की एक शाखा) और अभाव ब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों (प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा) के मतों की निःसारता का प्रतिपादन किया गया है। आगे सूत्र १२ में इन दोनों वादों का यथासम्भव पर्यालोचन किया जायेगा ।। ५ ।। १. सुखदुःखयोर्बहिर्मननम् । (शि० सू०, ३. ३३) २. मूढस्य भावो मूढत्वं वेद्यवेदनसामर्थ्याभावः । (स्प० का०, पृष्ठ ३१) ३. यतः तस्यापि अवस्थान्तरे मूढोऽहमासम् इति प्रत्यवमर्शमानत्वात् वेद्यत्वं स्थितमेव केवलं तत्कालमनुपलम्भः (स्प० का० पृष्ठ ३१.),
सूत्र—जिस आत्मबल (स्पन्दात्मकबल) के स्पर्शमात्र से ही, आन्तर शक्तिचक्र के
[ स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ] इस प्रकार स्पन्दतत्त्व की परमार्थसत्ता को सिद्ध करके अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं कि विश्व के अणु अणु में उसी स्पन्दात्मक पारमेश्वरी शक्ति के स्वातन्त्र्य का प्रसार स्पष्टरूप में दृष्टिगोचर होता है। वह शक्ति उसी स्वातन्त्र्य के द्वारा जड़वर्ग में अनुस्यूत होकर उसको भी ठीक चेतनधर्मा ही बना लेती है। अतः बड़ी लगन और अथक प्रयत्न के द्वारा उस मौलिक तत्त्व के परीक्षण करने से ही मनुष्यजन्म चरितार्थ हो सकता है। यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम्। सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥६॥ लभते, तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात्। यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥७॥ यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत् उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः, सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः । तस्मात् तत् तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं योगिना। यथास्य करणादिषु चैतन्यदाने स्वातन्त्र्यम्, तथा परपुरादिष्वपि सम्भाव्यते; स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥ अनुवाद सूत्र—जिस आत्मबल (स्पन्दात्मकबल) के स्पर्शमात्र से ही, आन्तर शक्तिचक्र के साथ साथ, उस बाह्य अचेतन इन्द्रियवर्ग को भी चेतन की तरह ही सृष्टि, स्थिति और संहार करने का धर्म प्राप्त होता है, उस तत्त्व (स्पन्दात्मक स्वभाव) का परीक्षण महती श्रद्धा और भगीरथ प्रयत्न के द्वारा करना चाहिये। ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि उस तत्त्व की स्वभाव- भूत स्वतन्त्रता विश्व के अणु अणु में (प्रत्येक शरीर और प्रत्येक दशा में) व्याप्त है ॥६-७॥ वृत्ति—जिस तत्त्व के बलस्पर्श से आन्तर करणेश्वरीचक्र (खेचरी इत्यादि शक्तिचक्र) के साथ, इस सारे इन्द्रिय वर्ग को, स्वतः अचेतन (जड़) होने पर भी, चेतन की तरह ही सृष्टि, स्थिति और संहार करने का धर्म प्राप्त होता है, वह तत्त्व दूसरे (जड़वर्ग से संबंधित) पदार्थों को चेतनता प्रदान करने में समर्थ होने के कारण, स्वयं स्वभावहीन (चैतन्य से रहित) कैसे हो सकता है? अतः योगी को चाहिये कि वह भगीरथ प्रयत्न के द्वारा उस तत्त्व का परीक्षण करे। जिस प्रकार उस तत्त्व को इन्द्रिय इत्यादि जड़ वर्ग में चेतनता का संचार करने की स्वतन्त्रता है उसी प्रकार इस बात की भी सम्भावना है कि वह दूसरे शरीर, प्राण इत्यादि को भी चेतनधर्मा बनाने में स्वतन्त्र है। सहज-स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहंप्रत्यवमर्श) ही प्रत्येक पदार्थ का स्वभाव (अपना वास्तविक भाव-आत्मा) बन कर अवस्थित है। अतः अभ्यास (श्रमहीन साधना) करते से ही उसकी अनुभूति हो जाती है ॥ ६-७ ॥
४६ स्पन्दकारिका विवरण प्रस्तुत सूत्रों का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इनमें प्रयुक्त 'करणवर्ग' 'आन्तरचक्र' तथा 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृती:' इन दार्शनिक शब्दों का अभिप्राय समझना आवश्यक है। अतः निम्नलिखित पंक्तियों में इन पर यावत्-शक्य प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जा रहा है— १. करणवर्गं—'करण' शब्द का अर्थ वह कोई अपेक्षिततम साधन है जिसके बिना किसी कार्य की निष्पत्ति नहीं हो सकती है। संसार के आदान-प्रदान में किसी भी चेतन प्राणी के अन्तर में विद्यमान भावात्मक विश्व का बाहर के नामरूपात्मक व्यक्त विश्व के साथ और बाहर का आन्तर के साथ सम्बन्धित होने का कार्य चलता रहता है। इसी को दैनिक-जीवन का व्यवहार कहते हैं। इस जीवन व्यवहार के, ज्ञानप्रधानता में सङ्कल्पन, निश्चयन, अभि- मानन, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, आस्वादन, जिघ्रण ( सूंघना ); और, क्रियाप्रधानता में चलना, उठना, बोलना, मलत्याग और आनन्दानुभूति ये तेरह रूप हैं। इनमें से पहले तीन का आन्तर भावनात्मक और शेष का बाह्य नामरूपात्मक विश्व के साथ सम्बन्ध है। इन तेरह प्रकार के कार्यों को करने वाले साधन तेरह इन्द्रियां हैं। अतः इस इन्द्रियवर्ग का ही शास्त्रीय नाम करणवर्ग है। इन तेरह इन्द्रियों का उपर्युक्त कार्यों के अनुसार विभाग इस प्रकार है— तीन अन्तःकरण—मनस्, बुद्धि और अहंकार। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका। पाँच कर्मेन्द्रियाँ—पाद, हस्त, जिह्वा, पायु, उपस्थ। इनमें से जिह्वा आस्वाद के समय ज्ञानेन्द्रिय और बोलने के समय कर्मेन्द्रिय बन जाती है। ये सारे करण स्वयं अचेतन हैं अतः उपर्युक्त कार्यों को करना इनका अपना धर्म नहीं है। विशेषस्पन्दों की धारायें ही इनमें संचारित होकर इनको चेतनधर्मा बना लेती हैं जिससे ये चेतन की तरह संकल्पमात्र से ही तत्तत्कार्य करते रहते हैं। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि ये स्वयं ही सारा काम करते हैं परन्तु वास्तव में काम करने की शक्ति इनसे इतर होकर इनमें अनुस्यूत होती है और ये स्वयं उसके साधनमात्र होते हैं। यदि इनमें ये सारे कार्य करना अपना ही धर्म होता तो मृत्यु हो जाने के अनन्तर भी इनसे वह धर्म छूटने न पाता। २. आन्तर-चक्र—पहले सूत्र के विवरण में आन्तर शक्तिचक्र के विषय में कुछ संकेत दिया गया है। यह भी कहा गया है कि वास्तव में परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति अथवा स्पन्दशक्ति एक ही है जो अनन्त एवं अपरिमित धाराओं में प्रवहमान होकर विश्व के अणु अणु का रूप धारण करती है। शक्ति की इन्हीं अनन्त धाराओं को शास्त्रों में आन्तरचक्र या करणेश्वरीचक्र का नाम दिया गया है। तन्त्रालोक, स्वच्छन्द, विज्ञानभैरव इत्यादि अनेक शैवग्रन्थों में परमेश्वर की अनेक शक्तियों और अनेक चक्रों की विस्तृत विवेचना की गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ में भी आगे कई स्थानों पर इनकी ओर संकेत किया गया है जिन पर यथासम्भव प्रकाश डाला जायेगा।
स्पन्दतत्त्व की भूमिका ४७ यहाँ पर इस चक्र से उस शक्तिवर्ग का अभिप्राय है जो प्रमाता ( जीव ) के अन्तःकरणों, बहिष्करणों ( इन्द्रियवर्ग ) और प्रमेयभावों को स्फुरणा प्रदान करता है । इस शक्तिवर्ग के खेचरी¹, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी ये चार प्रधान विभाग किये गये हैं। इस विषय में निम्नलिखित बातें स्मरणीय हैं । परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति विश्व का बाह्यप्रसार करने की भूमिका पर 'वामेश्वरी'² रूप धारण कर लेती है । शास्त्रकारों ने यह नामकरण निम्नलिखित उपपत्तियों के आधार पर किया है— १. यह विश्व का वमन करती है अर्थात् स्वरूप में केवल 'अहं' रूप में ही अवस्थित भावमण्डल का, बाह्य 'इदं' रूप में अवभासन करती है । २. यह वाम अर्थात् उल्टा आचरण करती है । भाव यह कि स्वभाव के विरुद्ध रूप को अर्थात् संसार के रूप को धारण करके सारे विश्व को अनन्त आपत्तियों और जन्ममरण का विषय बना लेती है । ३. यह संसार-भाव के विरुद्ध आचरण करती है । भाव यह कि पारमेश्वर शक्तिपात का पात्र बने हुए व्यक्तियों में शिवभाव का विकास करती है । ऐसी वामेश्वरी शक्ति ही उपर्युक्त खेचरी इत्यादि चार शक्तियों की मूलभूता शक्ति है । ये खेचरी इत्यादि शक्तियाँ³ पशुभाव में पड़े हुए शिव को मोह में डाल कर उसकी बुद्धि में संसारी हेय पदार्थों के प्रति अहं-अभिनिवेश का दुराग्रह उत्पन्न करती हैं जिससे उसको अपने वास्तविक विश्वात्मभाव और अपनी अबाध एवं असीम पञ्चविधकृत्य- कारिता का ज्ञान नहीं रहता है । परमेश्वर की इसी अवस्था को 'संसारभाव' कहते हैं । इतना होते हुए भी इस शक्तिवर्ग का काम द्विमुखी है। जहाँ⁴ ये शक्तियाँ अज्ञानी पुरुषों को अधोगति के गर्त में धकेलती रहती हैं वहाँ सद्गुरुओं की कृपा से निर्मल हृदय वाले पुरुषों को शिवभाव पर आरूढ कराने की क्षमता भी रखती है। ऐसे⁵ सावधान साधकों के हृदयों में ये शक्तियां मूढ़भाव को उत्पन्न नहीं करती हैं। वे तो शरीर, प्राण इत्यादि में रहते हुए भी साक्षात् शिव ही होते हैं । १. खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ-अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परि- स्फुरन्ती, ( प्र० हृ०, सू० १२) । २. किञ्च चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती•••• । ( तत्रैव ) । ३. तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् । (प्र० हृ०, १२ सूत्र) ४. पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः । (मुक्तक, भट्टदामोदर, उदाहृत प्र० हृ०, सूत्र १२) ५. एवं संकुचितशक्तिः प्राणादिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम्, ••••• वामेश्वरीसमावेशात् चिन्मय एव ( तत्रैव )
४६ स्पन्दकारिका इन चारों शक्तिचक्रों के स्वरूप के विषय में शास्त्रकारों का मन्तव्य संक्षेप में इस प्रकार है— १. खेचरी—ज्ञान¹ के अनन्त आकाश में विचरण करने वाली शक्तियाँ। अपने मूलरूप में इन शक्तियों का नाम 'चिद्गगनचरी' (चिदाकाश में विचरण करने वाली) है। परन्तु² जब परमेश्वर की सर्वकर्तृता आदि असंकुचित और असीम पाँच शक्तियाँ संकोच में पड़कर कला, विद्या आदि पाँच कञ्चुकों का रूप धारण करती हैं तब पशुभूमिका पर उनका 'खेचरी-चक्र' पड़ता है। इस अवस्था में पशुओं के ज्ञान के क्षेत्र पर संकोच का आवरण डालकर अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप को छिपा लेती है जिससे वे अपने आपको शक्ति-दरिद्र एवं असहाय जैसा समझते हैं। ³दूसरी ओर यही शक्तिवर्ग सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व इत्यादि पाँच असीम परमेश्वरी शक्तिरूपों में स्पन्दायमान होता हुआ, अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप से पतिप्रमाता के हृदय को विकसित करता रहता है। २. गोचरी—⁴परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार वाणियों के और अन्तःकरणों के क्षेत्र में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता के हृदय को भेदव्याप्ति में डालकर अपारमार्थिक संकल्पविकल्पों का शिकार बना लेता है और दूसरी ओर पतिप्रमाता के हृदय में पूर्ण अभेद-व्याप्ति के रूप में स्फुरणशील रहता है। ३. दिक्धरी—५पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ नामक दस दिशाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुओं की इन्द्रियों को बाहर संसार की ओर प्रवहमान बनाकर, उनके द्वारा उनको बाह्य विषयों का भेदरूप में ग्रहण करवाता रहता है और दूसरी ओर प्रतिप्रमाता को अन्तर्मुखीन एवं अतीन्द्रिय संवेदन के द्वारा प्रत्येक पदार्थ का अभेद 'अहं' रूप में ग्रहण करवाता है। ४. भूचरी—६शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच प्रमेय भूमिकाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता को भिन्न-भिन्न रूपों में अवभासित होने वाले घट पट इत्यादि अनन्त प्रमेयजालों के गोरखधन्धे में फंसा लेता है और दूसरी ओर पति- प्रमाता को उन्हीं अनन्त रूपों वाले प्रमेय पदार्थों का, अपने ही अङ्गों के समान, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही अनुभव करा लेता है। १. खे बोधगगने चरतीति। (प्र० हृ०, सू० १२) २. पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति। (प्र० हृ०, सू० १२) ३. पतिभूमिकायां तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन। (तत्रैव) ४. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ५. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ६. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२.
स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ४९ सारा आन्तर शक्तिचक्र स्पन्दमयी संवित् के साथ अभिन्न होने के कारण सतत- स्पन्दमय अर्थात् नित्यचेतन है। यही नित्य-चेतन शक्तिवर्ग सारे इन्द्रियवर्ग में और इनसे इतर देह, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि में चेतना का संचार करके उनको चेतन के समान- धर्मा बना लेता है जिससे संसारी जीव भी अपनी अपनी अनुरूप परिधि में उसी प्रकार सृष्टि संहारादि कार्य करता रहता है जिसप्रकार स्वयं परमेश्वर अपने असीम विश्वात्मस्वरूप में करता रहता है। जीवभाव में इन्द्रियों की प्रवृत्ति, स्थिति और संहृति (सृष्टि, स्थिति, संहार) की दशा— १. प्रवृत्ति (सृष्टि)—१अपने अपने ग्राह्य विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) को ग्रहण करने के अवसरों पर इन्द्रियों की, उनकी ओर उन्मुख होने की अवस्था को इन्द्रियों की प्रवृत्ति या 'सृष्टिदशा' कहते हैं। २. स्थिति—२अपने-अपने अनुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के अनन्तर, कुछ समय तक उन्हीं के साथ तन्मय होकर, विश्रान्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की 'स्थिति- दशा' कहते हैं। ३. संहार—अभिलषित३ कार्य समाप्त हो जाने पर, उन्हीं ग्रहण किये हुए ग्राह्य पदार्थों से अलग होकर, अपने कार्य से निवृत्त होने की दशा को, इन्द्रियों की 'संहारदशा' कहते हैं। इसको दूसरे शब्दों में इन्द्रियों की 'प्रत्यस्तमयावस्था' भी कहते हैं। इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सारे आन्तर शक्तिचक्र और तद्द्वारा बाह्य इन्द्रिय-वर्ग अथवा सारे जडवर्ग को सत्ता देने वाला मूलतत्त्व अहंप्रत्यवमर्शात्मक स्पन्द- तत्त्व (संवित्भट्टारिका) ही है। अब रहा प्रश्न उस तत्त्व की परीक्षा का। इस विषय में शास्त्रों के गहरे अध्ययन, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राप्त यथार्थ अनुभूति और सर्वोपरि शक्तिरूप गुरुचरणों की सेवा निष्काम-भाव से करने की आवश्यकता है। सातवें सूत्र के उत्तरार्द्ध 'यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा' के द्वारा सूत्रकार ने इस बात का संकेत भी दिया है कि अथक प्रयत्न और अटूट श्रद्धा से उस मौलिक तत्त्व की परीक्षा करने से ही मितप्रमाता को अपने मूलभूत सहज-स्वातन्त्र्य की अनुभूति हो पाती है ॥ ६-७॥ [ मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ] पूर्व सूत्र में कहा गया है कि शाश्वत स्पन्दमय अनुत्तरतत्त्व स्वतन्त्र इच्छाशक्ति के द्वारा अचेतन इन्द्रियवर्ग में चेतना का संचार करके उनको चेतनधर्मा बना लेता है। इस सम्बन्ध में यह शंका उत्पन्न हो जाती है कि फिर पतिप्रमाता और जडवर्ग के बीच में १. 'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थोन्मुखतासमुन्मिषदवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) २. 'स्थितिः' गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) ३. 'संहृतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्तमयावस्था'। (तत्रैव)
सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के
५० स्पन्दकारिका अवस्थित पशुप्रमाता (संसारी जीव) के लिए कौन सा स्थान अवशिष्ट रह जाता है ? क्या वह सदा के लिए दोनों के बीच में अटका हुआ रहकर, कहीं और दिशा से आई हुई इच्छारूपी चाबुक की मार से, इन्द्रियों को अपने अपने कार्य की ओर प्रवृत्त होने की मात्र प्रेरणा देता रहता है ? इस शंका का निवारण अगले सूत्र में किया जा रहा है— न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । 'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ न चेच्छाप्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपि तु स्वस्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव स बाह्यान्तरं कार्यमुत्पादयति, तेन न करण- विषयमेव सामर्थ्यम्, किं तु तस्य सर्वत्र ॥८॥ अनुवाद सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरकमात्र बनकर ही नहीं रह जाता है अपितु आत्मबल का स्पर्श होने की दशा में स्वयं भी उसी (पतिप्रमाता) के समान बन जाता है ॥८॥ वृत्ति—यह नहीं सोचना चाहिये कि यह मितप्रमाता पारमेश्वरी इच्छारूपी अंकुश के द्वारा इन्द्रियवर्ग को अपना अपना काम करने की मात्र प्रेरणा देता रहता है, अपितु, इसका अभिप्राय यह है कि यह अपने स्वरूप में ही स्थित रहकर, अपनी इच्छा के अनुसार बाह्य एवं आभ्यन्तर कार्यों की सृष्टि करता है। ऐसी दशा में इसको केवल इन्द्रियों को विषयाभि- मुख बनाने का सामर्थ्य ही नहीं होता है अपितु प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्रता से कार्य करने की क्षमता भी प्राप्त ही होती है ॥८॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र वास्तव में पूर्वसूत्र की ही व्याख्या है। पूर्वसूत्र में जो कुछ कहा गया है उससे यह शङ्का सहज ही में उत्पन्न हो सकती है कि जब पतिप्रमाता सीधा ही जडवर्ग में चेतनासंचार करके संसार के कार्य चलाता है तो संसारी ग्राहकवर्ग अर्थात् संसार के सारे जीवों का अस्तित्व ही संशय में पड़ जाता है परन्तु वस्तुस्थिति तो इससे कुछ भिन्न ही देखने में आती है। संसार के प्रत्येक आदान-प्रदान के समय हम देखते हैं कि प्रत्येक संसारी जीव (ग्राहक जीव) अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपनी इन्द्रियों को सहजरूप में विषयों की ओर अभि- मुख या उनसे निवृत्त कर लेता है। आखिर किसी भी प्रकार का कार्यकलाप सम्पन्न होने के समय परमेश्वर स्वयं ही हिमालय जैसे ऊंचे मंच पर खड़ा होकर जीवों को कठपुतलियों की १. सूत्र के इन दो चरणों का यह अभिप्राय भी निकल सकता है कि साधारण जीवों में भी आत्मबल का ही अंशतः स्पर्श होता है जिससे वे भी अपनी संकुचित परिधि में परमात्मा की तरह ही अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने में सक्षम होते हैं।
मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५१ तरह नचाता तो नहीं रहता है। यदि ऐसी ही परिस्थिति होती तो संसार के सारे ग्राहकवर्ग के अस्तित्व का अभिप्राय ही क्या होता ? साथ ही जब संसार का सारा ग्राहकवर्ग प्रत्यक्षरूप में स्वयं ही प्रत्येक प्रकार का आदान-प्रदान करता हुआ देखने में आता है तो इस यथार्थ को पारमेश्वरी इच्छामात्र का नाम देकर टाला भी कैसे जा सकता है। इस शङ्का का समाधान तब तक मिलना असम्भव है जब तक यह न समझा जाये कि शैवसिद्धान्त के अनुसार पतिप्रमाता१, पशुप्रमाता२ और सारे ग्राह्यवर्ग३ (जडप्रमेयवर्ग) का वास्तविक स्वरूप क्या है ? क्या ये तीन प्रकार की अलग अलग और पारस्परिक सम्बन्ध- रहित स्वतन्त्र सत्तायें हैं या एक ही मूलभूत सत्ता के तीन रूपान्तरमात्र हैं ? इस सम्बन्ध में यह भी विचारणीय है कि सूत्रकार ने इसी सूत्र में जो आत्मबल के स्पर्श की पहेली बुझा दी है उसका वास्तविक अभिप्राय क्या है। आत्मबल स्वयं क्या है और वह किसको स्पर्श करता है ? शैवशास्त्रियों का मन्तव्य है कि वास्तव में सतत-स्पन्दमयी पारमेश्वर सत्ता स्वयं ही इन तीनों रूपों में प्रकाशमान है। वह४ सत्ता विभु होने के कारण सर्वव्यापक; नित्य होने के कारण आदि और अन्त से रहित; विश्वाकृति होने के कारण स्वयं ही चेतनरूप और जडरूप और विश्व के विचित्र आकार-प्रकारों का अवभासन करने वाली है। सच बात तो यह कि इन कारणों से वह स्वयं ही बहुरूपिया है। असीम एवं अनन्त शक्तियों से परिपूर्ण शिव, विश्व का बाह्य अवभासन करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय सर्वप्रथम उसका अवभासन स्वरूप से अभिन्न अहंविमर्श के रूप में ही करता है। इस अवभासन का शास्त्रीय नाम 'आदिसर्ग'५ है। अनन्तर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा स्वरूप पर ही आवरण डालकर, स्वात्मरूप६ दर्पण में ही अनन्त प्रकार के ग्राहकों और ग्राह्यों का अवभासन करता है। संसारी ग्राहक- दशा७ और ग्राह्यदशा स्वरूप पर पड़े हुए आवरण के तारतम्य और अनुपात पर ही आधारित १. शिव—पूर्णप्रमाता, पतिप्रमाता। २. जीव—संसारी ग्राहक, मितप्रमाता। ३. सारा जडवर्ग, ग्राह्य, ज्ञेयविषय। ४. विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः । विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥ ततोऽस्य बहुरूपत्वम्......... । (तं० १.६१-६२) ५. विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यतिरिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदि- सर्गः' तत्र तत्रागमेषु उच्यते। (तं० वि०, १.१३५) ६. अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्य- ग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति। (तत्रैव) ७. सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः। आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः। जडाजडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता॥ (तं०, १.१३४-५)
५२ स्पन्दकारिका है। इस प्रकार परमेश्वर स्वयं ही तीनों रूपों में भासमान है। निम्नलिखित तालिका से यह बात स्पष्ट हो जायेगी:—
| प्रमाता का रूप | आवरण का तारतम्य | शक्तित्व का स्वरूप | आकार | भावों का रूप | भेद | |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १. | पति प्रमाता | विशुद्ध, चिद्रूप<br>अनावृत | ज्ञातृत्व और कर्तृ-<br>त्वरूपपूर्ण-<br>स्वातन्त्र्य | विश्वात्मभाव<br>आकारहीन | सारे भाव अपने ही अंग जैसे | भेदरहित<br>सर्वव्यापक |
| २. | पशु प्रमाता | चिदचित्,<br>आधा आवृत<br>आधा अनावृत | संकुचित<br>ज्ञान और<br>क्रिया | देह, प्राण<br>पुर्यष्टक और<br>शून्य | सारे भाव<br>अपने से<br>भिन्न | देवता<br>मानव<br>पशुपक्षिवर्ग |
| ३. | जड<br>प्रमेय | अचित्<br>चिद्रूपता-<br>पूर्ण आवृत | ज्ञेयभाव<br>और<br>कार्यभाव | जड<br>पंचमहाभूत | घोरमूढ़ता में<br>पड़े रहने के<br>कारण<br>संज्ञाहीनता | सारी<br>स्थावर<br>प्रकृति के<br>असंख्यभेद |
| वास्तव¹ में संसार में दिखाई देने वाली अनन्त भावराशि परमात्मा की अनन्त | ||||||
| शक्तियों के विश्वमय प्रसार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह इसको अपने स्वतन्त्र | ||||||
| संकल्पमात्र से ही अवभासित करता है। स्वरूपतः एकाकार होने पर भी ग्राहकरूप या | ||||||
| ग्राह्यरूप अनेकाकारता को अवभासित करने की संकल्पात्मक क्षमता ही परमेश्वर का | ||||||
| क्रियात्मक स्वातन्त्र्य है जो संकुचित ग्राहकवर्ग में सम्भव नहीं हो सकता है। चैतन्य² किसी | ||||||
| दूसरे वस्तु की अपेक्षा से रूपप्रसार नहीं करता है अपितु यह उसका अकाट्य स्वभाव ही है। | ||||||
| भूमि में डाला हुआ बीज लोकयात्रा की अपेक्षा से अंकुर नहीं बनता है अपितु अंकुरित | ||||||
| १. एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । | ||||||
| भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥ | ||||||
| (ई० प्र०, २. ४. २) | ||||||
| २. न लोकयात्राभिप्रायज्जनयेद् बीजमङ्कुरम् । | ||||||
| किन्तु स्वभावात्...........................॥ | ||||||
| (ई० सि०, ४१) |