भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 190 में से

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४६ स्पन्दकारिका इन चारों शक्तिचक्रों के स्वरूप के विषय में शास्त्रकारों का मन्तव्य संक्षेप में इस प्रकार है— १. खेचरी—ज्ञान¹ के अनन्त आकाश में विचरण करने वाली शक्तियाँ। अपने मूलरूप में इन शक्तियों का नाम 'चिद्गगनचरी' (चिदाकाश में विचरण करने वाली) है। परन्तु² जब परमेश्वर की सर्वकर्तृता आदि असंकुचित और असीम पाँच शक्तियाँ संकोच में पड़कर कला, विद्या आदि पाँच कञ्चुकों का रूप धारण करती हैं तब पशुभूमिका पर उनका 'खेचरी-चक्र' पड़ता है। इस अवस्था में पशुओं के ज्ञान के क्षेत्र पर संकोच का आवरण डालकर अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप को छिपा लेती है जिससे वे अपने आपको शक्ति-दरिद्र एवं असहाय जैसा समझते हैं। ³दूसरी ओर यही शक्तिवर्ग सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व इत्यादि पाँच असीम परमेश्वरी शक्तिरूपों में स्पन्दायमान होता हुआ, अपने वास्तविक 'चिद्गगनचरी' रूप से पतिप्रमाता के हृदय को विकसित करता रहता है। २. गोचरी—⁴परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार वाणियों के और अन्तःकरणों के क्षेत्र में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता के हृदय को भेदव्याप्ति में डालकर अपारमार्थिक संकल्पविकल्पों का शिकार बना लेता है और दूसरी ओर पतिप्रमाता के हृदय में पूर्ण अभेद-व्याप्ति के रूप में स्फुरणशील रहता है। ३. दिक्धरी—५पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ नामक दस दिशाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुओं की इन्द्रियों को बाहर संसार की ओर प्रवहमान बनाकर, उनके द्वारा उनको बाह्य विषयों का भेदरूप में ग्रहण करवाता रहता है और दूसरी ओर प्रतिप्रमाता को अन्तर्मुखीन एवं अतीन्द्रिय संवेदन के द्वारा प्रत्येक पदार्थ का अभेद 'अहं' रूप में ग्रहण करवाता है। ४. भूचरी—६शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच प्रमेय भूमिकाओं में विचरण करने वाला शक्तिवर्ग—एक ओर पशुप्रमाता को भिन्न-भिन्न रूपों में अवभासित होने वाले घट पट इत्यादि अनन्त प्रमेयजालों के गोरखधन्धे में फंसा लेता है और दूसरी ओर पति- प्रमाता को उन्हीं अनन्त रूपों वाले प्रमेय पदार्थों का, अपने ही अङ्गों के समान, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही अनुभव करा लेता है। १. खे बोधगगने चरतीति। (प्र० हृ०, सू० १२) २. पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति। (प्र० हृ०, सू० १२) ३. पतिभूमिकायां तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन। (तत्रैव) ४. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ५. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२. ६. द्रष्टव्य, प्र० हृ०, सूत्र १२.

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