स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्पन्दतत्त्व की भूमिका ४७ यहाँ पर इस चक्र से उस शक्तिवर्ग का अभिप्राय है जो प्रमाता ( जीव ) के अन्तःकरणों, बहिष्करणों ( इन्द्रियवर्ग ) और प्रमेयभावों को स्फुरणा प्रदान करता है । इस शक्तिवर्ग के खेचरी¹, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी ये चार प्रधान विभाग किये गये हैं। इस विषय में निम्नलिखित बातें स्मरणीय हैं । परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति विश्व का बाह्यप्रसार करने की भूमिका पर 'वामेश्वरी'² रूप धारण कर लेती है । शास्त्रकारों ने यह नामकरण निम्नलिखित उपपत्तियों के आधार पर किया है— १. यह विश्व का वमन करती है अर्थात् स्वरूप में केवल 'अहं' रूप में ही अवस्थित भावमण्डल का, बाह्य 'इदं' रूप में अवभासन करती है । २. यह वाम अर्थात् उल्टा आचरण करती है । भाव यह कि स्वभाव के विरुद्ध रूप को अर्थात् संसार के रूप को धारण करके सारे विश्व को अनन्त आपत्तियों और जन्ममरण का विषय बना लेती है । ३. यह संसार-भाव के विरुद्ध आचरण करती है । भाव यह कि पारमेश्वर शक्तिपात का पात्र बने हुए व्यक्तियों में शिवभाव का विकास करती है । ऐसी वामेश्वरी शक्ति ही उपर्युक्त खेचरी इत्यादि चार शक्तियों की मूलभूता शक्ति है । ये खेचरी इत्यादि शक्तियाँ³ पशुभाव में पड़े हुए शिव को मोह में डाल कर उसकी बुद्धि में संसारी हेय पदार्थों के प्रति अहं-अभिनिवेश का दुराग्रह उत्पन्न करती हैं जिससे उसको अपने वास्तविक विश्वात्मभाव और अपनी अबाध एवं असीम पञ्चविधकृत्य- कारिता का ज्ञान नहीं रहता है । परमेश्वर की इसी अवस्था को 'संसारभाव' कहते हैं । इतना होते हुए भी इस शक्तिवर्ग का काम द्विमुखी है। जहाँ⁴ ये शक्तियाँ अज्ञानी पुरुषों को अधोगति के गर्त में धकेलती रहती हैं वहाँ सद्गुरुओं की कृपा से निर्मल हृदय वाले पुरुषों को शिवभाव पर आरूढ कराने की क्षमता भी रखती है। ऐसे⁵ सावधान साधकों के हृदयों में ये शक्तियां मूढ़भाव को उत्पन्न नहीं करती हैं। वे तो शरीर, प्राण इत्यादि में रहते हुए भी साक्षात् शिव ही होते हैं । १. खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ-अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परि- स्फुरन्ती, ( प्र० हृ०, सू० १२) । २. किञ्च चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती•••• । ( तत्रैव ) । ३. तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् । (प्र० हृ०, १२ सूत्र) ४. पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः । (मुक्तक, भट्टदामोदर, उदाहृत प्र० हृ०, सूत्र १२) ५. एवं संकुचितशक्तिः प्राणादिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम्, ••••• वामेश्वरीसमावेशात् चिन्मय एव ( तत्रैव )