स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ स्पन्दकारिका विवरण प्रस्तुत सूत्रों का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इनमें प्रयुक्त 'करणवर्ग' 'आन्तरचक्र' तथा 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृती:' इन दार्शनिक शब्दों का अभिप्राय समझना आवश्यक है। अतः निम्नलिखित पंक्तियों में इन पर यावत्-शक्य प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जा रहा है— १. करणवर्गं—'करण' शब्द का अर्थ वह कोई अपेक्षिततम साधन है जिसके बिना किसी कार्य की निष्पत्ति नहीं हो सकती है। संसार के आदान-प्रदान में किसी भी चेतन प्राणी के अन्तर में विद्यमान भावात्मक विश्व का बाहर के नामरूपात्मक व्यक्त विश्व के साथ और बाहर का आन्तर के साथ सम्बन्धित होने का कार्य चलता रहता है। इसी को दैनिक-जीवन का व्यवहार कहते हैं। इस जीवन व्यवहार के, ज्ञानप्रधानता में सङ्कल्पन, निश्चयन, अभि- मानन, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, आस्वादन, जिघ्रण ( सूंघना ); और, क्रियाप्रधानता में चलना, उठना, बोलना, मलत्याग और आनन्दानुभूति ये तेरह रूप हैं। इनमें से पहले तीन का आन्तर भावनात्मक और शेष का बाह्य नामरूपात्मक विश्व के साथ सम्बन्ध है। इन तेरह प्रकार के कार्यों को करने वाले साधन तेरह इन्द्रियां हैं। अतः इस इन्द्रियवर्ग का ही शास्त्रीय नाम करणवर्ग है। इन तेरह इन्द्रियों का उपर्युक्त कार्यों के अनुसार विभाग इस प्रकार है— तीन अन्तःकरण—मनस्, बुद्धि और अहंकार। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका। पाँच कर्मेन्द्रियाँ—पाद, हस्त, जिह्वा, पायु, उपस्थ। इनमें से जिह्वा आस्वाद के समय ज्ञानेन्द्रिय और बोलने के समय कर्मेन्द्रिय बन जाती है। ये सारे करण स्वयं अचेतन हैं अतः उपर्युक्त कार्यों को करना इनका अपना धर्म नहीं है। विशेषस्पन्दों की धारायें ही इनमें संचारित होकर इनको चेतनधर्मा बना लेती हैं जिससे ये चेतन की तरह संकल्पमात्र से ही तत्तत्कार्य करते रहते हैं। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि ये स्वयं ही सारा काम करते हैं परन्तु वास्तव में काम करने की शक्ति इनसे इतर होकर इनमें अनुस्यूत होती है और ये स्वयं उसके साधनमात्र होते हैं। यदि इनमें ये सारे कार्य करना अपना ही धर्म होता तो मृत्यु हो जाने के अनन्तर भी इनसे वह धर्म छूटने न पाता। २. आन्तर-चक्र—पहले सूत्र के विवरण में आन्तर शक्तिचक्र के विषय में कुछ संकेत दिया गया है। यह भी कहा गया है कि वास्तव में परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति अथवा स्पन्दशक्ति एक ही है जो अनन्त एवं अपरिमित धाराओं में प्रवहमान होकर विश्व के अणु अणु का रूप धारण करती है। शक्ति की इन्हीं अनन्त धाराओं को शास्त्रों में आन्तरचक्र या करणेश्वरीचक्र का नाम दिया गया है। तन्त्रालोक, स्वच्छन्द, विज्ञानभैरव इत्यादि अनेक शैवग्रन्थों में परमेश्वर की अनेक शक्तियों और अनेक चक्रों की विस्तृत विवेचना की गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ में भी आगे कई स्थानों पर इनकी ओर संकेत किया गया है जिन पर यथासम्भव प्रकाश डाला जायेगा।