भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 190 में से

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स्पन्दतत्त्व की उपादेयता ४९ सारा आन्तर शक्तिचक्र स्पन्दमयी संवित् के साथ अभिन्न होने के कारण सतत- स्पन्दमय अर्थात् नित्यचेतन है। यही नित्य-चेतन शक्तिवर्ग सारे इन्द्रियवर्ग में और इनसे इतर देह, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि में चेतना का संचार करके उनको चेतन के समान- धर्मा बना लेता है जिससे संसारी जीव भी अपनी अपनी अनुरूप परिधि में उसी प्रकार सृष्टि संहारादि कार्य करता रहता है जिसप्रकार स्वयं परमेश्वर अपने असीम विश्वात्मस्वरूप में करता रहता है। जीवभाव में इन्द्रियों की प्रवृत्ति, स्थिति और संहृति (सृष्टि, स्थिति, संहार) की दशा— १. प्रवृत्ति (सृष्टि)—१अपने अपने ग्राह्य विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) को ग्रहण करने के अवसरों पर इन्द्रियों की, उनकी ओर उन्मुख होने की अवस्था को इन्द्रियों की प्रवृत्ति या 'सृष्टिदशा' कहते हैं। २. स्थिति—२अपने-अपने अनुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के अनन्तर, कुछ समय तक उन्हीं के साथ तन्मय होकर, विश्रान्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की 'स्थिति- दशा' कहते हैं। ३. संहार—अभिलषित३ कार्य समाप्त हो जाने पर, उन्हीं ग्रहण किये हुए ग्राह्य पदार्थों से अलग होकर, अपने कार्य से निवृत्त होने की दशा को, इन्द्रियों की 'संहारदशा' कहते हैं। इसको दूसरे शब्दों में इन्द्रियों की 'प्रत्यस्तमयावस्था' भी कहते हैं। इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सारे आन्तर शक्तिचक्र और तद्द्वारा बाह्य इन्द्रिय-वर्ग अथवा सारे जडवर्ग को सत्ता देने वाला मूलतत्त्व अहंप्रत्यवमर्शात्मक स्पन्द- तत्त्व (संवित्भट्टारिका) ही है। अब रहा प्रश्न उस तत्त्व की परीक्षा का। इस विषय में शास्त्रों के गहरे अध्ययन, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राप्त यथार्थ अनुभूति और सर्वोपरि शक्तिरूप गुरुचरणों की सेवा निष्काम-भाव से करने की आवश्यकता है। सातवें सूत्र के उत्तरार्द्ध 'यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा' के द्वारा सूत्रकार ने इस बात का संकेत भी दिया है कि अथक प्रयत्न और अटूट श्रद्धा से उस मौलिक तत्त्व की परीक्षा करने से ही मितप्रमाता को अपने मूलभूत सहज-स्वातन्त्र्य की अनुभूति हो पाती है ॥ ६-७॥ [ मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ] पूर्व सूत्र में कहा गया है कि शाश्वत स्पन्दमय अनुत्तरतत्त्व स्वतन्त्र इच्छाशक्ति के द्वारा अचेतन इन्द्रियवर्ग में चेतना का संचार करके उनको चेतनधर्मा बना लेता है। इस सम्बन्ध में यह शंका उत्पन्न हो जाती है कि फिर पतिप्रमाता और जडवर्ग के बीच में १. 'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थोन्मुखतासमुन्मिषदवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) २. 'स्थितिः' गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था। (स्प० का०, पृष्ठ ३४) ३. 'संहृतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्तमयावस्था'। (तत्रैव)