भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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५० स्पन्दकारिका अवस्थित पशुप्रमाता (संसारी जीव) के लिए कौन सा स्थान अवशिष्ट रह जाता है ? क्या वह सदा के लिए दोनों के बीच में अटका हुआ रहकर, कहीं और दिशा से आई हुई इच्छारूपी चाबुक की मार से, इन्द्रियों को अपने अपने कार्य की ओर प्रवृत्त होने की मात्र प्रेरणा देता रहता है ? इस शंका का निवारण अगले सूत्र में किया जा रहा है— न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । 'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ न चेच्छाप्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपि तु स्वस्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव स बाह्यान्तरं कार्यमुत्पादयति, तेन न करण- विषयमेव सामर्थ्यम्, किं तु तस्य सर्वत्र ॥८॥ अनुवाद सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरकमात्र बनकर ही नहीं रह जाता है अपितु आत्मबल का स्पर्श होने की दशा में स्वयं भी उसी (पतिप्रमाता) के समान बन जाता है ॥८॥ वृत्ति—यह नहीं सोचना चाहिये कि यह मितप्रमाता पारमेश्वरी इच्छारूपी अंकुश के द्वारा इन्द्रियवर्ग को अपना अपना काम करने की मात्र प्रेरणा देता रहता है, अपितु, इसका अभिप्राय यह है कि यह अपने स्वरूप में ही स्थित रहकर, अपनी इच्छा के अनुसार बाह्य एवं आभ्यन्तर कार्यों की सृष्टि करता है। ऐसी दशा में इसको केवल इन्द्रियों को विषयाभि- मुख बनाने का सामर्थ्य ही नहीं होता है अपितु प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्रता से कार्य करने की क्षमता भी प्राप्त ही होती है ॥८॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र वास्तव में पूर्वसूत्र की ही व्याख्या है। पूर्वसूत्र में जो कुछ कहा गया है उससे यह शङ्का सहज ही में उत्पन्न हो सकती है कि जब पतिप्रमाता सीधा ही जडवर्ग में चेतनासंचार करके संसार के कार्य चलाता है तो संसारी ग्राहकवर्ग अर्थात् संसार के सारे जीवों का अस्तित्व ही संशय में पड़ जाता है परन्तु वस्तुस्थिति तो इससे कुछ भिन्न ही देखने में आती है। संसार के प्रत्येक आदान-प्रदान के समय हम देखते हैं कि प्रत्येक संसारी जीव (ग्राहक जीव) अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपनी इन्द्रियों को सहजरूप में विषयों की ओर अभि- मुख या उनसे निवृत्त कर लेता है। आखिर किसी भी प्रकार का कार्यकलाप सम्पन्न होने के समय परमेश्वर स्वयं ही हिमालय जैसे ऊंचे मंच पर खड़ा होकर जीवों को कठपुतलियों की १. सूत्र के इन दो चरणों का यह अभिप्राय भी निकल सकता है कि साधारण जीवों में भी आत्मबल का ही अंशतः स्पर्श होता है जिससे वे भी अपनी संकुचित परिधि में परमात्मा की तरह ही अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने में सक्षम होते हैं।