स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंमितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५१ तरह नचाता तो नहीं रहता है। यदि ऐसी ही परिस्थिति होती तो संसार के सारे ग्राहकवर्ग के अस्तित्व का अभिप्राय ही क्या होता ? साथ ही जब संसार का सारा ग्राहकवर्ग प्रत्यक्षरूप में स्वयं ही प्रत्येक प्रकार का आदान-प्रदान करता हुआ देखने में आता है तो इस यथार्थ को पारमेश्वरी इच्छामात्र का नाम देकर टाला भी कैसे जा सकता है। इस शङ्का का समाधान तब तक मिलना असम्भव है जब तक यह न समझा जाये कि शैवसिद्धान्त के अनुसार पतिप्रमाता१, पशुप्रमाता२ और सारे ग्राह्यवर्ग३ (जडप्रमेयवर्ग) का वास्तविक स्वरूप क्या है ? क्या ये तीन प्रकार की अलग अलग और पारस्परिक सम्बन्ध- रहित स्वतन्त्र सत्तायें हैं या एक ही मूलभूत सत्ता के तीन रूपान्तरमात्र हैं ? इस सम्बन्ध में यह भी विचारणीय है कि सूत्रकार ने इसी सूत्र में जो आत्मबल के स्पर्श की पहेली बुझा दी है उसका वास्तविक अभिप्राय क्या है। आत्मबल स्वयं क्या है और वह किसको स्पर्श करता है ? शैवशास्त्रियों का मन्तव्य है कि वास्तव में सतत-स्पन्दमयी पारमेश्वर सत्ता स्वयं ही इन तीनों रूपों में प्रकाशमान है। वह४ सत्ता विभु होने के कारण सर्वव्यापक; नित्य होने के कारण आदि और अन्त से रहित; विश्वाकृति होने के कारण स्वयं ही चेतनरूप और जडरूप और विश्व के विचित्र आकार-प्रकारों का अवभासन करने वाली है। सच बात तो यह कि इन कारणों से वह स्वयं ही बहुरूपिया है। असीम एवं अनन्त शक्तियों से परिपूर्ण शिव, विश्व का बाह्य अवभासन करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय सर्वप्रथम उसका अवभासन स्वरूप से अभिन्न अहंविमर्श के रूप में ही करता है। इस अवभासन का शास्त्रीय नाम 'आदिसर्ग'५ है। अनन्तर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा स्वरूप पर ही आवरण डालकर, स्वात्मरूप६ दर्पण में ही अनन्त प्रकार के ग्राहकों और ग्राह्यों का अवभासन करता है। संसारी ग्राहक- दशा७ और ग्राह्यदशा स्वरूप पर पड़े हुए आवरण के तारतम्य और अनुपात पर ही आधारित १. शिव—पूर्णप्रमाता, पतिप्रमाता। २. जीव—संसारी ग्राहक, मितप्रमाता। ३. सारा जडवर्ग, ग्राह्य, ज्ञेयविषय। ४. विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः । विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥ ततोऽस्य बहुरूपत्वम्......... । (तं० १.६१-६२) ५. विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यतिरिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदि- सर्गः' तत्र तत्रागमेषु उच्यते। (तं० वि०, १.१३५) ६. अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्य- ग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति। (तत्रैव) ७. सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः। आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः। जडाजडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता॥ (तं०, १.१३४-५)